न केस, न कैश... 46 साल बाद चाबी लौटाई, ईमानदारी ने फिर जीता भरोसे का दिल
हिसार, 9 अगस्त।
जहां आज किरायेदारी के विवाद अदालतों की चौखट तक पहुंचते हैं, वहीं हिसार की जैन गली में ईमानदारी ने एक बार फिर इंसानियत का सिर ऊंचा कर दिया। करीब 46 वर्षों से दुकान चलाने वाले टेलर मास्टर गिरधारी लाल ने शनिवार को बिना किसी विवाद, बिना किसी मांग और बिना एक रुपया लिए दुकान की चाबी मकान मालिक के पौत्र एडवोकेट राजेश जैन को सौंप दी।
यह सिर्फ चाबी का लेन-देन नहीं था, यह विश्वास की वह चाबी थी जिसने रिश्तों के बंद दरवाजे खोल दिए।
स्वर्गीय श्री प्रकाश जैन की बिल्डिंग में एसके टेलर्स के नाम से दुकान चला रहे गिरधारी लाल ने वर्ष 1980 में यह दुकान किराए पर ली थी। चार दशक से अधिक समय तक इसी दुकान में सिलाई का काम कर उन्होंने अपना कारोबार चलाया और परिवार का पालन-पोषण किया। समय बदला, जरूरतें बदलीं, लेकिन विश्वास नहीं बदला।
बीच में जब मकान मालिक को दुकान की आवश्यकता हुई तो मास्टर जी ने मौखिक सूचना पर दुकान खाली कर दी। बाद में उन्होंने दुकान किसी अन्य को नहीं दी और जब स्वयं जरूरत पड़ी तो उन्हें फिर से दुकान किराए पर दे दी गई। अब उनके पुत्र राकेश कुमार एसके टेलर्स का काम संभाल रहे हैं और परिवार ने इसी गली में दूसरी दुकान किराए पर ले ली है।
शनिवार को पड़ोसी दुकानदारों की मौजूदगी में मास्टर गिरधारी लाल ने दुकान की चाबी एडवोकेट राजेश जैन को सौंप दी। न कोई शिकवा, न कोई शिकायत; न केस, न कैश—बस विश्वास और वर्षों पुराने रिश्ते की सौगात।
“मास्टर जी के सामने ही बड़ा हुआ और वकील बना”
इस अवसर पर एडवोकेट राजेश जैन ने कहा कि मास्टर जी से उनके परिवार का संबंध वर्षों पुराना है। “मैं मास्टर जी के सामने ही बड़ा हुआ और फिर वकालत के पेशे में आया। लोग दुकान खाली कराने के लिए वर्षों अदालतों के चक्कर लगाते हैं, लेकिन मास्टर जी ने दुकान खाली करने के लिए एक पैसा तक नहीं लिया और न ही उनके खिलाफ कोई केस करने की जरूरत पड़ी।” उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब संपत्ति और किरायेदारी को लेकर विवाद अक्सर रिश्तों में दरार डाल देते हैं, ऐसे समय में मास्टर गिरधारी लाल का कदम ईमानदारी की ऐसी इबारत है, जिसे वक्त भी आसानी से मिटा नहीं सकता।
दुकान खाली हुई, मगर रिश्तों की जगह और बड़ी हो गई
मास्टर गिरधारी लाल ने दुकान की चाबी जरूर लौटा दी, लेकिन 46 वर्षों की यादें, विश्वास और आत्मीयता की पूंजी वहीं छोड़ गए। यह घटना बताती है कि संपत्ति बड़ी हो सकती है, मगर विश्वास उससे बड़ा होता है; दुकान की कीमत हो सकती है, मगर रिश्तों की कीमत नहीं। एक चाबी ने दुकान का दरवाजा बंद किया, लेकिन ईमानदारी और इंसानियत के दरवाजे खोल दिए। एक रुपया नहीं लिया, लेकिन सम्मान की ऐसी दौलत अर्जित की, जिसकी कीमत कोई बाजार तय नहीं कर सकता। यही है ईमानदारी—जहां हिसाब खत्म होता है, वहां विश्वास की कहानी शुरू होती है।
