हरियाणा में सरकारी वकीलों के पदनाम पर ही  उठा कानूनी सवाल

 

 50 वर्ष  पहले देश की संसद ने हटा दिया था ‘अटॉर्नी’ शब्द, परन्तु आज भी सेवा नियमों में उल्लेख  !

हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ए.डी.ए.) के 255 पदों पर चयन के लिए जारी  इंटरव्यू के बीच उठा मुद्दा; हाईकोर्ट एडवोकेट ने प्रदेश सरकार और गृह विभाग  के उच्च  अधिकारियों को  भेजा नोटिस

सवाल : जब सरकारी वकील सिविल न्यायालयों  में गवर्नमेंट प्लीडर (जी.पी.) और क्रिमिनल अदालतों में पब्लिक प्रासीक्यूटर  (पी.पी.) के रूप में काम करते हैं, तो सेवा नियमों में जिला न्यायवादी (डी.ए.), उप जिला न्यायवादी (डी.डी.ए.) और  सहायक जिला न्यायवादी (ए.डी.ए.)  जैसे पदनाम का क्या  औचित्य

चंडीगढ़ -- हरियाणा सरकार की सेवा में नियमित तौर तौर पर नियुक्त और कार्यरत सरकारी वकीलों के पदनाम को लेकर एक नया कानूनी विवाद सामने आया है। देश की  संसद ने आज से 50 वर्ष पूर्व  1976 में अधिवक्ता अधिनियम (एडवोकेट्स एक्ट), 1961 में संशोधन किया था। अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने सवाल उठाया है कि जब अधिवक्ता अधिनियम में ‘अटॉर्नी (न्यायवादी)’ शब्द से संबंधित पुरानी व्यवस्था में बदलाव किया जा चुका है, तो हरियाणा सरकार की  अभियोजन  विधिक सेवा (प्रॉसिक्यूशन लीगल सर्विस) के ग्रुप (ए) और ग्रुप (बी) सेवा नियमों में यह शब्द आज भी क्यों प्रयोग  हो रहा है?

यह सवाल ऐसे समय उठा है, जब हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) द्वारा इसी माह  10 से 18 अक्टूबर तक असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) के 255 पदों पर चयन के लिए साक्षात्कार लिए जा रहे हैं.  हेमंत ने हाल ही में इस मामले में हरियाणा के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, गृह सचिव, एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता), विधि परामर्शी (एल.आर.) और निदेशक अभियोजन सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजकर पदनामों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने और सेवा नियमों की समीक्षा करने की मांग की है।

1976 में कानून बदला, लेकिन नियमों में ‘अटॉर्नी’ कायम !

हेमंत के अनुसार, हरियाणा अभियोजन विधिक सेवा (ग्रुप-बी) सेवा नियम, 2001 में असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) तथा ग्रुप-ए सेवा नियम, 2013 में डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (DA) और डिप्टी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (DDA) जैसे पदनामों का इस्तेमाल किया गया है।

उनका तर्क है कि राज्य सरकार के सेवा नियम संसद द्वारा बनाए गए केंद्रीय कानून के अनुरूप होने चाहिए। इसलिए इन पदनामों में प्रयुक्त ‘अटॉर्नी’ शब्द की कानूनी स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए।

हेमंत का कहना है कि संसद द्वारा 1976 में अधिवक्ता अधिनियम में किए गए संशोधन के बाद वकालत के पेशे में मान्य श्रेणियां एडवोकेट और सीनियर एडवोकेट हैं। उनके अनुसार, इसी कानूनी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार के नियमित विधि अधिकारियों के पदनामों की समीक्षा आवश्यक है।

न्यायिक अदालतों  में G.P. और P.P. लेकिन  सेवा नियमों में D.A., D.D.A. और A.D.A.

नोटिस में एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू भी उठाया गया है। हेमंत के अनुसार, सरकारी वकील सिविल मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत गवर्नमेंट प्लीडर-जी.पी. (Government Pleader-GP) और आपराधिक मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत पब्लिक प्रॉसीक्यूटर-पी.पी. (Public Prosecutor-PP) के रूप में पदांकित  किए जाते हैं।

उनका कहना है कि न्यायालयों में कार्य करते समय इन अधिकारियों की भूमिका और पदनाम को लेकर जी.पी. तथा पी.पी. जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, जबकि सेवा नियमों में डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी, डिप्टी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी और असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी जैसे नाम बने हुए हैं।

इसी अंतर को आधार बनाकर उन्होंने राज्य सरकार से स्पष्ट करने की मांग की है कि इन पदनामों का वर्तमान केंद्रीय कानूनों के साथ क्या संबंध है और क्या इनमें संशोधन की आवश्यकता है।

केंद्र और एडवोकेट जनरल कार्यालय का भी दिया हवाला

हेमंत . ने अपने नोटिस में केंद्र सरकार के विधि अधिकारियों के प्रचलित पदनामों का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, लॉ ऑफिसर, लीगल एडवाइजर, गवर्नमेंट काउंसल और पब्लिक प्रॉसीक्यूटर जैसे पदनाम सरकारी विधि व्यवस्था में इस्तेमाल होते हैं।

उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट स्थित हरियाणा के एडवोकेट जनरल कार्यालय में प्रचलित पदनामों—सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल, एडिशनल एडवोकेट जनरल, सीनियर डिप्टी एडवोकेट जनरल, डिप्टी एडवोकेट जनरल और असिस्टेंट एडवोकेट जनरल—का भी हवाला दिया है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हरियाणा लॉ ऑफिसर्स (एंगेजमेंट) अधिनियम, 2016 में ‘अटॉर्नी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।

संविधान में अनुच्छेद 76 का हवाला

नोटिस में संविधान के अनुच्छेद 76 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसमें भारत का  महान्यायवादी (Attorney General for India) के संवैधानिक पद का प्रावधान है। हेमंत का तर्क है कि जिला न्यायवादी, उप जिला न्यायवादी और सहायक जिला न्यायवादी जैसे पदनामों के लिए लागू कानूनी आधार तथा उनकी शब्दावली की अलग से जांच की जानी चाहिए।

हालांकि, केवल किसी शब्द का संविधान में उल्लेख न होना अपने आप में उस नाम से राज्य सेवा पद सृजित करने को अवैध सिद्ध नहीं करता। ऐसे पदनामों की वैधता का प्रश्न संबंधित केंद्रीय कानूनों, राज्य के सक्षम विधायी अधिकारों और लागू सेवा नियमों के समग्र परीक्षण से तय होगा।

सेवा नियम बदलने की मांग

हेमंत ने हरियाणा सरकार से मांग की है कि राज्य अभियोजन विधिक सेवा के ग्रुप-ए और ग्रुप-बी सेवा नियमों की समीक्षा की जाए तथा जरूरत के अनुसार ‘अटॉर्नी’ शब्द हटाकर गवर्नमेंट एडवोकेट, गवर्नमेंट प्लीडर, पब्लिक प्रॉसीक्यूटर या लॉ ऑफिसर जैसे उपयुक्त पदनाम अपनाए जाएं।

उनका कहना है कि इससे सरकारी विधि अधिकारियों के पदनामों में एकरूपता आएगी और सेवा नियमों को मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप बनाने में मदद मिलेगी।

अब निगाहें प्रदेश सरकार पर: हरियाणा लोक सेवा आयोग (एच.पी.एस.सी.) के 255 ADA पदों के साक्षात्कार के बीच उठे इस सवाल पर संबंधित विभाग क्या रुख अपनाते हैं और क्या सेवा नियमों में संशोधन की प्रक्रिया शुरू होती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा