हरियाणा की वार्ड समितियों पर कानूनी पेच, नगर निगमों में गठन को लेकर उठे गंभीर सवाल

 

 

एक ओर जहाँ  गत माह 17 अगस्त को हरियाणा के शहरी स्थानीय निकाय विभाग द्वारा जारी एक  पत्र अनुसार प्रदेश में स्थापित  नगर निगमों  के वार्डों के लिए गठित  वार्ड समितियों  की बैठक आयोजित करने बारे निर्देश  जारी  गया वहीं दूसरी ओर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट एडवोकेट और म्यूनिसिपल कानून जानकार हेमंत कुमार ने अपने गृह जिला अंबाला की नगर निगम और पड़ोसी जिले पंचकूला की नगर निगमजिन दोनों के लिए इसी वर्ष गत मई महीने पूर्व आम चुनाव कराए गए थेदोनों के हाऊस ( सदनों) द्वारा

बीती  जुलाई में गठित सभी 20-20 वार्ड समितियों को गैर-कानूनी बताते दोनों नगर निगमों और प्रदेश के शहरी निकाय विभाग को नोटिस भेजा है‌ जिसमें उन्होंने  दावा किया है  कि अम्बाला और पंचकूला  नगर निगमों द्वारा गठित सभी वार्ड कमेटियां पूरी तरह अवैधअधिकार क्षेत्र से बाहर एवं मौजूदा  कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन  हैं। नोटिस की प्रति प्रदेश सरकार के शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त एवं सचिव, महानिदेशक और विभाग के उच्च अधिकारियों को भी भेजी गयी है.

 

 

2008 का कानून नगर निगमों पर लागू ही नहीं

 

हेमंत के अनुसार दोनों  नगर निगमों ने वार्ड कमेटियों के गठन का आधार हरियाणा म्युनिसिपल सिटिजन्स पार्टिसिपेशन एक्ट, 2008 को बनाया हैजबकि इस कानून की धारा 2(जी) स्पष्ट रूप से "म्युनिसिपेलिटी (नगर-निकाय)" की परिभाषा केवल हरियाणा म्युनिसिपल एक्ट, 1973 के अंतर्गत गठित नगर परिषदों और नगर पालिकाओं तक सीमित करती है।

 

उन्होंने कहा कि हरियाणा में स्थापित सभी 11 नगर निगमों

 का गठन हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 के तहत हुआ हैइसलिए 2008 का अधिनियम उस पर लागू ही नहीं होता। ऐसे में उक्त कानून के आधार पर वार्ड कमेटियों का गठन पूर्णतः अधिकारविहीन और असंवैधानिक है।

 

1994 के कानून में भी निगम को नहीं मिला अधिकार

 

ज्ञापन  में यह भी उल्लेख किया  गया है कि यदि नगर निगमों में वार्ड कमेटियों का गठन किया जाना होतो उसका प्रावधान हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 की धारा 10 में है।

 

हेमंत  के अनुसार इस धारा में वार्ड कमेटियों के गठन का अधिकार केवल राज्य सरकार को दिया गया है। नगर निगममहापौरनिगम सदन अथवा नगर आयुक्त को ऐसा कोई अधिकार नहीं सौंपा गया है। इसलिए नगर निगम के सदनों  द्वारा स्वयं वार्ड कमेटियां गठित करना कानून के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन है।

 

'दो-दो कानूनों का उल्लंघन'

 

हेमंत  ने दावा किया कि यह कार्रवाई दो स्वतंत्र कानूनी आधारों पर अवैध है

 

पहलाजिस 2008 के अधिनियम का सहारा लिया गयावह नगर निगमों पर लागू ही नहीं होता।

दूसरा, 1994 के नगर निगम अधिनियम के अनुसार भी वार्ड कमेटियां गठित करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास हैनगर निगम के पास नहीं।

उन्होंने कहा कि किसी भी वैधानिक संस्था को वही अधिकार प्राप्त होते हैंजो कानून स्पष्ट रूप से प्रदान करता है। कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण (जैसे नगर निगम सदन  स्वयं अपने लिए ऐसे अधिकार नहीं बना सकता) जो विधानसभा  ने उसे दिए ही न हों।

 

हेमंत ने कहा कि यदि बिना कानूनी अधिकार के गठित इन वार्ड कमेटियों को जारी रहने दिया गया तो यह विधानसभा  द्वारा निर्धारित कानूनी सीमाओं का खुला उल्लंघन होगा. यही  नहीं कानूनी प्रावधानों के विरूद्ध जाकर गठित नगर निगम की  वार्ड समितियों के गठन को  अदालत में भी चुनौती दी जा सकती है.

 

हालांकि हेमंत ने बताया कि अगर प्रदेश विधानसभा द्वारा  हरियाणा नगर-निकाय नागरिक भागीदारी अधिनियम, 2008 की धारा 2 (जी) में संशोधन कर उसमें  

स्पष्ट रूप से "म्युनिसिपेलिटी (नगर-निकाय)" की परिभाषा केवल हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 के अंतर्गत गठित  नगर निगमों को भी शामिल कर लिया जाता है और साथ  साथ उपरोक्त हरियाणा नगर निगम कानून, 1994 की धारा 10 में भी संशोधन कर नगर निगमों में वार्ड समितियों के गठन का अधिकार प्रदेश सरकार की बजाय निगम सदन को दे दिया जाता हैतो  हरियाणा में नगर निगम के सदनों द्वारा गठित सभी वार्ड समितियों को वैधता अर्थात कानूनी मान्यता प्राप्त हो सकती है.

 

बहरहाल, गत माह 25 अगस्त को अम्बाला मंडल के आयुक्त संजीव वर्मा द्वारा जिला  उपायुक्त (डी.सी.) सचिन गुप्ता और न.नि. आयुक्त  वीरेन्द्र सिंह सहरावत को पत्र भेजकर उन्हें  अम्बाला  नगर निगम सदन  द्वारा गठित सभी  20 वार्ड समितियों को गैर-कानूनी बताने सम्बन्धी  एडवोकेट हेमंत कुमार द्वारा   भेजे गये नोटिस पर  नियमानुसार आगामी आवश्यक करने के लिए लिखा गया  था हालांकि आज तक इस विषय पर वाछित कार्रवाई की जानी लंबित है.