जल सुरक्षा के लिए चक्रीय जल प्रबंधन जरूरी

 

 

'अर्बन अड्डा 2026' में डॉ. सतबीर सिंह कादियान ने दिया मजबूत नीतिगत ढांचा अपनाने पर जोर

 

चंडीगढ़ , 6 अक्टूबर -नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर के जैकारंडा हॉल में गुरुजल द्वारा 'अर्बन अड्डा 2026' का आयोजन किया गया। "जल सुरक्षा के लिए सर्कुलरिटी"  विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में इस बात पर गहन विचार-विमर्श हुआ कि भारतीय शहर पानी को केवल एक उपयोगिता के बजाय एक चक्रीय संसाधन (सर्कुलर वाटर) के रूप में कैसे प्रबंधित कर सकते हैं, जिससे जल संचयन, कम खपत, अधिक पुनः उपयोग और भूजल रिचार्जिंग को बढ़ावा देकर जल संकट और बाढ़ जैसी स्थितियों से निपटा जा सके।

 

 इस कार्यक्रम के दौरान एचआईआरएमआई (HIRMI) के ईआईसी-सह-प्रधान निदेशक डॉ. सतबीर सिंह कादियान ने देश को अनियंत्रित जल दोहन से चक्रीय जल उपयोग की ओर ले जाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव रखे। उन्होंने कहा कि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पानी की स्थिति भिन्न होती है, जैसा कि गुरुग्राम का उदाहरण दर्शाता है जहाँ एक ही वर्ष में शहरी स्थलों पर भूजल स्तर 0.08 मीटर से 2.34 मीटर तक गिर गया। इसलिए नियामक एक ही राष्ट्रव्यापी मॉडल पर निर्भर नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें तीन मुख्य संरचनात्मक आयामों पर काम करना होगा।

 

डॉ. कादियान ने पहला मुद्दा आर्थिक संकेतों और प्रोत्साहनों की री-इंजीनियरिंग का उठाया। उन्होंने बताया कि जब तक ताजा भूजल निकालना सस्ता रहेगा और उपचारित अपशिष्ट जल पर उच्च उपचार व परिवहन लागत का बोझ रहेगा, तब तक चक्रीय जल उपयोग डिफ़ॉल्ट विकल्प नहीं बन पाएगा। इसके लिए वाणिज्यिक व औद्योगिक जल निष्कर्षण पर टैरिफ और भूजल उपकर बढ़ाने की आवश्यकता है। साथ ही, सभी कार्यों के लिए महंगे तृतीयक उपचार मानकों को अनिवार्य करने से बचते हुए "उद्देश्य के अनुकूल" (Fit-for-Purpose) गुणवत्ता मानकों को अपनाना चाहिए ताकि शहरी हरित क्षेत्रों, निर्माण, अखाद्य फसलों की सिंचाई और झीलों के जीर्णोद्धार में द्वितीयक-उपचारित पानी का उपयोग बढ़ाया जा सके।

 

 इसके अलावा परिवहन पाइपलाइनों के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) और प्राथमिकता वाले ऋण जैसे उपाय किए जाने चाहिए। दूसरे आयाम में उन्होंने विभिन्न राज्यों के सफल मॉडलों से सीख लेने की बात कही। नागपुर और चेन्नई के पीपीपी एंकर-ऑफटेकर मॉडल ने दिखाया है कि औद्योगिक मांग का उपयोग करके सीवेज को नगरपालिका के राजस्व का स्रोत बनाया जा सकता है। दिल्ली और बेंगलुरु के विकेंद्रीकृत उपचार मॉडल यह दर्शाते हैं कि स्थानीयकृत उपचार से परिवहन लागत कम होती है और स्थानीय जलभृत (aquifers) सीधे रिचार्ज होते हैं।

 

 वहीं हरियाणा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि राज्य की एकीकृत जल संसाधन कार्य योजना (IWRAP) और हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) एक एकीकृत ढांचा प्रदान करते हैं। हरियाणा में 27 एसटीपी (STP) से मिलने वाले 326 MLD उपचारित पानी के उपयोग के लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया जा रहा है, जिसमें से 20 एसटीपी की परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।

 

इसके अलावा 'वॉटर सिक्योर हरियाणा प्रोजेक्ट' के तहत 4 एसटीपी के 171 MLD उपचारित पानी के पुनः उपयोग के लिए सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का प्रस्ताव है। 

 

 तीसरे आयाम के रूप में उन्होंने मुख्य विनियामक हस्तक्षेपों पर बल दिया। उन्होंने कहा कि निगरानी को केवल डिस्चार्ज मानकों तक सीमित रखने के बजाय निर्माण, शीतलन, बागवानी और रिचार्ज जैसे अंतिम-उपयोग (End-Use) मानकों में बदला जाना चाहिए। नए एसटीपी की निविदाओं और खरीद चरण में ही पुनः उपयोग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए तथा केंद्रीकृत प्लांट्स की तुलना में विकेंद्रीकृत एसटीपी को बढ़ावा मिलना चाहिए, क्योंकि बड़े प्लांट्स से पानी वापस ले जाना काफी महंगा होता है।

 

 इसके साथ ही टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए भी शहर-विशिष्ट योजनाएं बनाना और समर्पित राज्य-स्तरीय जल पुनः उपयोग निकायों की स्थापना करना आवश्यक है।

 

 अंत में डॉ. सतबीर सिंह कादियान ने स्पष्ट किया कि भविष्य के जल नियमन को केवल बुनियादी ढांचा बनाने की संख्या गिनने के बजाय वास्तविक जल परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।