तीन दशक बाद फिर सजी गुरु-शिष्य की महफिल, पुरानी यादों में खोए विद्यार्थी
पूर्व प्राध्यापक एवं प्राचार्य धर्मवीर मलिक और प्रो. कुलदीप दलाल को विद्यार्थियों ने किया विशेष रूप से आमंत्रित, भावुक हुए गुरुजन
धर्मवीर मलिक बोले- विद्यार्थियों ने इस रिश्ते को कभी सेवानिवृत्त नहीं होने दिया
बहादुरगढ़, 2 नवंबर
समय की रफ्तार के साथ जीवन में बहुत कुछ बदल जाता है, लेकिन गुरु और शिष्य के बीच स्नेह, सम्मान और आत्मीयता का रिश्ता कभी पुराना नहीं पड़ता। इसी अनमोल रिश्ते की खूबसूरत मिसाल उस समय देखने को मिली, जब राजकीय महाविद्यालय, बहादुरगढ़ के 1990 के दशक के पूर्व विद्यार्थी करीब तीन दशक बाद एक बार फिर एक मंच पर जुटे। गांव सोलधा में आयोजित इस मिलन समारोह में कॉलेज के दिनों की यादें ताजा हुई और अपने प्रिय गुरुजनों से मिलकर विद्यार्थियों के चेहरे खिल उठे। वहीं, अपने पुराने विद्यार्थियों का इतना स्नेह देखकर गुरुजन भी भावुक हो गए।
समारोह की खास बात यह रही कि पूर्व विद्यार्थियों ने अपने अजीज इतिहास के प्राध्यापक एवं महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य धर्मवीर मलिक तथा प्रोफेसर कुलदीप दलाल को विशेष रूप से आमंत्रित किया। लगभग 20 वर्ष पहले सेवानिवृत्त हो चुके श्री मलिक के लिए अपने विद्यार्थियों के बीच पहुंचना एक भावुक और यादगार अनुभव रहा। विद्यार्थियों का अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान और वर्षों बाद भी बना आत्मीय जुड़ाव पूरे आयोजन में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
भावुक कर गए गुरु धर्मवीर मलिक के शब्द
अपने पूर्व विद्यार्थियों से मिलकर भावुक हुए प्रो. धर्मवीर मलिक ने कहा, “बीस वर्ष पूर्व मैंने एक शिक्षक के रूप में अपने विद्यार्थियों से विदा ली थी, लेकिन आज यह देखकर अभिभूत हूं कि मेरे विद्यार्थियों ने उस रिश्ते को कभी सेवानिवृत्त ही नहीं होने दिया।” उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और संतुष्टि क्या हो सकती है कि वर्षों बाद भी उसके विद्यार्थी उसे उसी स्नेह, सम्मान और आत्मीयता के साथ याद करें। विद्यार्थियों का यह अपनापन उनके लिए किसी अनमोल सम्मान से कम नहीं है। उन्होंने कहा, “मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि आज भी आप सब मुझे इतने स्नेह और आत्मीयता के साथ याद करते हैं।”
उनके इन भावपूर्ण शब्दों ने समारोह के माहौल को और भी आत्मीय बना दिया। गुरु के प्रति विद्यार्थियों का सम्मान और विद्यार्थियों के प्रति गुरु का स्नेह इस बात का प्रमाण बना कि शिक्षा का रिश्ता केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन भर व्यक्ति के साथ चलता है।
50 गांवों के विद्यार्थियों का प्रमुख केंद्र था महाविद्यालय
गौरतलब है कि अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों और नब्बे के दशक की शुरुआत में राजकीय महाविद्यालय, बहादुरगढ़ आसपास के करीब 50 गांवों तथा दिल्ली के सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस दौर में महाविद्यालय ने अनेक विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने, अपने व्यक्तित्व को निखारने और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया।
महाविद्यालय से जुड़े उसी दौर के विद्यार्थियों के लिए यह मिलन समारोह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को फिर से जीने जैसा अनुभव रहा। कॉलेज के दिनों की यादें, गुरुजनों का मार्गदर्शन और साथ पढ़ने वाले साथियों के साथ बिताए पल बातचीत का अहम हिस्सा बने।
यादों के साथ ताजा हुआ गुरु-शिष्य का अटूट रिश्ता
समारोह के दौरान विद्यार्थियों ने अपने गुरुजनों के प्रति आभार व्यक्त किया और कॉलेज जीवन से जुड़ी पुरानी यादें साझा कीं। वर्षों बाद एक-दूसरे से मिलकर सभी ने उस दौर के अनुभवों को याद किया, जब महाविद्यालय में शिक्षा के साथ-साथ जीवन के महत्वपूर्ण संस्कार भी प्राप्त हुए थे।
इस मिलन समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि शिक्षक का योगदान केवल विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं होता। एक अच्छा शिक्षक अपने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, विचारों और जीवन की दिशा को प्रभावित करता है। यही कारण है कि समय बीतने, जिम्मेदारियां बदलने और सेवानिवृत्ति के वर्षों बाद भी गुरु के प्रति सम्मान कम नहीं होता।
गांव सोलधा में आयोजित यह समारोह पुरानी यादों, भावनाओं और आत्मीयता से सराबोर रहा। तीन दशक के अंतराल के बाद एकत्र हुए पूर्व विद्यार्थियों और उनके गुरुजनों का यह मिलन इस बात का जीवंत प्रमाण बना कि समय बदल सकता है, पीढ़ियां आगे बढ़ सकती हैं और शिक्षक सेवानिवृत्त हो सकता है, लेकिन सच्चा गुरु-शिष्य का रिश्ता कभी सेवानिवृत्त नहीं होता।
