विदेशी तेल, घरेलू महँगाई

 
विदेशी तेल, घरेलू महँगाई

 

तेल की कीमतों का झटका और भारत में बढ़ती महँगाई

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ते ही क्यों महँगा होने लगता है भारत का जीवन? 

- डॉ. सत्यवान सौरभ

महँगाई केवल बाजार में वस्तुओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण काम करते हैं। जब किसी देश में विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं या कच्चे माल की कीमत बढ़ती है और उसका असर घरेलू बाजार की कीमतों पर पड़ता है, तो इसे आयातित महँगाई कहा जाता है। भारत जैसे देश के लिए यह चुनौती अधिक गंभीर है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था ऊर्जा की आवश्यकताओं के लिए काफी हद तक आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव इसलिए केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर परिवहन, उद्योग, कृषि, खाद्य पदार्थों और अंततः आम आदमी की जेब तक पहुँचता है।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ना भारत के लिए सीधे तौर पर महँगे आयात का संकेत है। जब वैश्विक स्तर पर युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन में कटौती, आपूर्ति बाधित होने या मांग बढ़ने जैसे कारणों से कच्चे तेल की कीमत अचानक बढ़ती है, तो भारत को उसी तेल के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। यही वह पहला बिंदु है जहाँ से आयातित महँगाई का दबाव शुरू होता है।

तेल की कीमत बढ़ने का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव ईंधन की लागत पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महँगे होने पर परिवहन लागत बढ़ जाती है। भारत में सड़क परिवहन व्यापार और आपूर्ति-श्रृंखला की रीढ़ है। खेत से मंडी, मंडी से थोक बाजार और वहाँ से दुकानों तक पहुँचने वाली अधिकांश वस्तुओं के परिवहन में ईंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए डीजल महँगा होते ही माल ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है। परिवहन कंपनियाँ बढ़ी हुई लागत को भाड़े में शामिल करती हैं और अंततः उसका भार उपभोक्ता तक पहुँचता है।

तेल का प्रभाव केवल परिवहन तक सीमित नहीं है। अर्थव्यवस्था के अनेक उद्योग ऊर्जा पर निर्भर हैं। सीमेंट, इस्पात, रसायन, उर्वरक और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योगों की उत्पादन लागत में ईंधन और ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादन लागत बढ़ती है। उद्योग अपनी लागत को नियंत्रित करने के लिए उत्पादों की कीमत बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार तेल का शुरुआती झटका धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में फैलने लगता है।

इसका असर खाद्य महँगाई पर भी दिखाई दे सकता है। किसान के लिए डीजल सिंचाई, कृषि मशीनरी और परिवहन में उपयोगी है। कृषि उपज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए भी ईंधन की जरूरत होती है। यदि परिवहन और कृषि संबंधी लागत बढ़ती है, तो सब्जियों, फलों, अनाज और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बन सकता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आया एक झटका घरेलू रसोई तक पहुँच सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में रुपये की विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का कारोबार सामान्यतः अमेरिकी डॉलर में होता है। यदि एक ओर तेल की वैश्विक कीमत बढ़ रही हो और दूसरी ओर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाए, तो भारतीय आयातकों के लिए कच्चा तेल और महँगा पड़ता है। यानी भारत को एक ही मात्रा के तेल के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे आयातित महँगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि महँगाई की अपेक्षाओं को भी प्रभावित करती है। जब लोगों और कारोबारियों को लगता है कि ईंधन महँगा होने के कारण आगे भी लागत बढ़ेगी, तो वे पहले से ही अपनी कीमतों में वृद्धि करने लगते हैं। मजदूरी, माल ढुलाई, सेवाओं और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इस तरह शुरुआती तेल झटका व्यापक महँगाई में बदलने की क्षमता रखता है। भारतीय रिजर्व बैंक के आकलनों में भी कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का मुद्रास्फीति पर स्पष्ट प्रभाव माना गया है; अक्सर उद्धृत अनुमान के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में 10 प्रतिशत वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य आधारित महँगाई पर लगभग 20 आधार अंकों का दबाव पड़ सकता है, हालांकि वास्तविक प्रभाव परिस्थितियों के अनुसार बदलता है।

ऐसे समय में सरकार और केंद्रीय बैंक के सामने संतुलन की चुनौती होती है। यदि ईंधन पर करों में बहुत अधिक वृद्धि की जाए तो उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है, जबकि अत्यधिक कर कटौती से सरकार के राजस्व पर दबाव आ सकता है। इसलिए असाधारण वैश्विक तेल झटकों के समय संतुलित और समयबद्ध कर नीति आवश्यक है। इसी प्रकार मौद्रिक नीति के स्तर पर महँगाई की दूसरी लहर को रोकना जरूरी है, लेकिन अत्यधिक कठोर कदम आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकते हैं।

दीर्घकालीन समाधान केवल तेल की कीमतों को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि तेल पर निर्भरता कम करने में है। भारत को कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में विविधता लानी होगी और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना होगा, ताकि वैश्विक आपूर्ति संकट के समय तत्काल दबाव कम किया जा सके। इसके साथ ही विद्युत वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना होगा। जितनी तेजी से अर्थव्यवस्था वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ेगी, उतनी ही कम उसकी संवेदनशीलता अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के झटकों के प्रति होगी।

भारत के लिए कच्चा तेल केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमत हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन उस कीमत का हमारी अर्थव्यवस्था पर कितना असर होगा, यह काफी हद तक हमारी नीतियों और तैयारी पर निर्भर करता है। आयातित महँगाई को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं, पर उसके प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है।

तेल की कीमतों का हर झटका हमें यही संदेश देता है कि ऊर्जा सुरक्षा ही आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। जब तक भारत अपनी आयात निर्भरता को कम नहीं करता, तब तक वैश्विक तेल बाजार की हलचल भारतीय बाजार और आम उपभोक्ता की जेब को प्रभावित करती रहेगी। इसलिए आज आवश्यकता केवल महँगाई से लड़ने की नहीं, बल्कि ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने की है जो बाहरी कीमतों के झटकों के सामने अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और टिकाऊ हो।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)