सूना हुआ मकान

 
 सूना हुआ मकान

 

झूठ सजे अखबार में, सच जाए वनवास।

शोर बहुत बाजार में, मौन हुआ विश्वास॥

कागज पर है योजना, धरती पर कुछ और।

जनता ढूँढे लाभ को, दफ्तर लगाएँ जोर॥

शिक्षा बनती जा रही, केवल धन का खेल।

ज्ञान खड़ा है द्वार पर, भीतर बैठा मेल॥

मोबाइल के इस दौर में, रिश्ते हुए उदास।

घर में बैठे लोग हैं, फिर भी मन ना पास॥

बेटे-बेटी दूर हैं, सूना हुआ मकान।

बूढ़ी आँखें राह में, ढूँढें स्वयं जहान॥

पद पाकर मत भूलना, मिला तुम्हे सम्मान।

कुर्सी आ-जाती रहे, बचता केवल मान॥

बदल रही है हर दिशा, बदल रहा संसार।

लेकिन मानवता बची, तो जीवन साकार॥

देश तभी मजबूत हो, जब मजबूत समाज।

न्याय, सत्य, सद्भाव से, बने सुनहरा राज॥