6 नियुक्तियों के बाद पूरे नोटिफिकेशन की वापसी, हरियाणा सरकार के आदेश की भाषा पर कानूनी सवाल
चंडीगढ़ | हरियाणा राज्य सूचना आयोग में नियुक्तियों को लेकर चल रहा विवाद अब सरकारी आदेश की शब्दावली और उसके संभावित कानूनी प्रभाव तक पहुंच गया है। मई 2025 में राज्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त की गईं प्रियंका धोपड़ा की नियुक्ति रद्द करने के लिए 31 जुलाई 2026 को मुख्य सचिव द्वारा जारी आदेश में प्रयुक्त भाषा पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने गंभीर कानूनी सवाल उठाए हैं।
हेमंत कुमार के अनुसार, सरकार का उद्देश्य यदि केवल प्रियंका धोपड़ा की नियुक्ति समाप्त करना था, तो 31 जुलाई के आदेश में ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों किया गया, जिसमें 23 मई 2025 के उस मूल नियुक्ति आदेश को ही वापस लेने का उल्लेख दिखाई देता है, जिसके माध्यम से राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तथा पांच राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां की गई थीं।
एक आदेश से छह नियुक्तियां, बाद के आदेश में पूरे दस्तावेज की वापसी का उल्लेख
मामले की जड़ 23 मई 2025 के सरकारी आदेश संख्या 01/01/2025-1 AR में है। इस आदेश के माध्यम से टी.वी.एस.एन. प्रसाद, आईएएस (सेवानिवृत्त) को राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा अमरजीत सिंह, कर्मवीर सैनी, नीता खेड़ा, प्रियंका धोपड़ा और संजय मदान को राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया था।
26 मई 2025 को शपथ ग्रहण समारोह भी आयोजित हुआ, लेकिन प्रियंका धोपड़ा को राज्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ नहीं दिलाई गई। इसके बाद करीब 14 महीने तक उनकी नियुक्ति की स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक आदेश सामने नहीं आया।
अंततः 31 जुलाई 2026 को सरकार की ओर से प्रियंका धोपड़ा की “कैंडिडेचर” रद्द किए जाने संबंधी आदेश जारी किया गया। यह आदेश मुख्य सचिव की आधिकारिक वेबसाइट पर 25 अगस्त 2026 को अपलोड किया गया।
‘आदेश’ को ‘नोटिफिकेशन’ बताने पर भी सवाल
एडवोकेट हेमंत कुमार ने 31 जुलाई के आदेश की शब्दावली के एक और पहलू पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि 23 मई 2025 का मूल दस्तावेज ‘Order’ था, जबकि बाद के आदेश में उसे ‘Notification’ के रूप में संदर्भित किया गया है।
उनके अनुसार, 31 जुलाई के आदेश में राज्यपाल द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(3) के तहत प्रियंका धोपड़ा की “कैंडिडेचर” रद्द किए जाने का उल्लेख है, लेकिन आदेश के अंत में जिस दस्तावेज को वापस लेने की बात कही गई है, वह वही मूल दस्तावेज प्रतीत होता है जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त सहित कुल छह नियुक्तियां की गई थीं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या बाकी नियुक्तियां भी प्रभावित होती हैं?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम कानूनी प्रश्न बन गया है। यदि 23 मई 2025 के पूरे नियुक्ति आदेश को ही बाद के आदेश से वापस लिया गया माना जाए, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या उसी आदेश के आधार पर नियुक्त राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य चार राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों पर भी इसका कोई प्रभाव पड़ता है?
हालांकि, सरकार की वास्तविक मंशा केवल प्रियंका धोपड़ा की नियुक्ति समाप्त करने की रही हो सकती है, लेकिन हेमंत कुमार का तर्क है कि सरकारी आदेश की भाषा ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे वैधानिक पदों पर अन्य नियुक्तियों की स्थिति को लेकर भ्रम पैदा हो।
तीन सप्ताह बाद भी सुधारात्मक कार्रवाई का इंतजार
इस मुद्दे को लेकर एडवोकेट हेमंत कुमार ने 26 अगस्त 2026 को राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त, सभी राज्य सूचना आयुक्तों तथा संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को विस्तृत कानूनी ज्ञापन भेजकर तत्काल स्पष्टीकरण एवं आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की मांग की थी।
उनके अनुसार, प्रतिनिधित्व भेजे जाने के करीब तीन सप्ताह बाद भी अपेक्षित सुधारात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है।
‘कैंडिडेचर’ रद्द हुई या नियुक्ति? शब्दावली पर भी पेच
मामले में एक दूसरा महत्वपूर्ण सवाल सरकारी आदेश में इस्तेमाल किए गए “कैंडिडेचर” शब्द को लेकर है।
23 मई 2025 के दस्तावेज में प्रियंका धोपड़ा सहित अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति की गई थी। ऐसे में 31 जुलाई 2026 के आदेश में उनकी “कैंडिडेचर” रद्द किए जाने का उल्लेख यह प्रश्न खड़ा करता है कि मई 2025 में सरकार की कार्रवाई को विधिक रूप से नियुक्ति माना गया था या केवल उम्मीदवारी/चयन?
हेमंत कुमार का कहना है कि यदि नियुक्ति हो चुकी थी, तो बाद में उसे समाप्त करने की कार्रवाई के लिए भी सटीक और विधि-सम्मत शब्दावली का प्रयोग आवश्यक था।
‘व्यक्ति नहीं, सरकारी आदेश की स्पष्टता का सवाल’
एडवोकेट हेमंत कुमार ने सरकार से मांग की है कि पूरे मामले का तत्काल संज्ञान लेकर एक स्पष्ट, सुसंगत और विधि-सम्मत संशोधित/स्पष्टीकरण आदेश जारी किया जाए, जिससे 23 मई 2025 के उसी आदेश से नियुक्त मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य राज्य सूचना आयुक्तों की स्थिति को लेकर किसी प्रकार का अनावश्यक भ्रम न रहे।
उनका कहना है कि यह मामला केवल प्रियंका धोपड़ा की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। यह वैधानिक पदों पर नियुक्तियों, सरकारी आदेशों में प्रयुक्त सटीक शब्दावली, प्रशासनिक पारदर्शिता और विधिक निश्चितता से जुड़ा प्रश्न है।
अब निगाहें हरियाणा सरकार के अगले कदम पर हैं। सवाल सीधा है—यदि केवल एक सूचना आयुक्त की नियुक्ति समाप्त करनी थी, तो क्या पूरे नियुक्ति आदेश को ‘वापस लेने’ वाली भाषा का इस्तेमाल करना विधिक और प्रशासनिक रूप से उचित था?
