झज्जर की बेटी दीपशिखा बेनीवाल ने अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में बनाई पहचान 

 झज्जर: हरियाणा के झज्जर जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में अपनी पहचान बनाने वाली डॉ. दीपशिखा बेनीवाल आज हजारों युवाओं, खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर उन्होंने न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी अलग पहचान स्थापित की है। झज्जर जिले के बेरी उपमंडल के सफीपुर गांव की रहने वाली डॉ. दीपशिखा ने अपने करियर की शुरुआत एक फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में की थी। आज वह इंटरनेशनल कैनो फेडरेशन (ICF) की पैराकैनो क्लासिफायर, संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (UNITAR) प्रमाणित स्पोर्ट्स डिप्लोमैट, सहायक प्रोफेसर और स्पोर्ट्स रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रही हैं।
 
झज्जर की बेटी दीपशिखा बेनीवाल ने अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में बनाई पहचान
झज्जर: हरियाणा के झज्जर जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में अपनी पहचान बनाने वाली डॉ. दीपशिखा बेनीवाल आज हजारों युवाओं, खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर उन्होंने न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी अलग पहचान स्थापित की है। झज्जर जिले के बेरी उपमंडल के सफीपुर गांव की रहने वाली डॉ. दीपशिखा ने अपने करियर की शुरुआत एक फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में की थी। आज वह इंटरनेशनल कैनो फेडरेशन (ICF) की पैराकैनो क्लासिफायर, संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (UNITAR) प्रमाणित स्पोर्ट्स डिप्लोमैट, सहायक प्रोफेसर और स्पोर्ट्स रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रही हैं।

एशियाई खेल प्रशासन में मिली बड़ी जिम्मेदारी

हाल ही में डॉ. दीपशिखा को एशियन कैनो कॉन्फेडरेशन पैराकैनो कमेटी का सदस्य नियुक्त किया गया है। इस महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए वह एशिया में पैराकैनो खेल को बढ़ावा देने, खेल प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय खेल नीति में भारत की भूमिका को सशक्त बनाने का काम करेंगी।

क्या होता है पैराकैनो क्लासिफायर?

पैराकैनो क्लासिफायर एक विशेष अधिकारी होता है, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग खिलाड़ियों की क्षमता और उनकी खेल श्रेणी का मूल्यांकन करता है। यह जिम्मेदारी आमतौर पर प्रशिक्षित चिकित्सा विशेषज्ञों या खेल तकनीकी विशेषज्ञों को दी जाती है। डॉ. दीपशिखा इस क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाली एशिया की पहली महिला ICF पैराकैनो मेडिकल क्लासिफायर बनी हैं।

11 साल की उम्र में पिता को खो दिया

डॉ. दीपशिखा की सफलता की कहानी आसान नहीं रही। उनके पिता सुरेंद्र सिंह बेनीवाल, जो झज्जर के एक केंद्रीय विद्यालय में अपर डिवीजन क्लर्क (UDC) थे, का निधन तब हो गया था जब दीपशिखा केवल 11 वर्ष की थीं। परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य के निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। घर चलाने के लिए केवल पारिवारिक पेंशन ही सहारा थी। लेकिन उनकी मां राजवंती बेनीवाल ने हार नहीं मानी और पूरे परिवार को संभाला। दीपशिखा बताती हैं कि उनकी मां ने कभी उन्हें परिस्थितियों के आगे झुकना नहीं सिखाया। उन्होंने हमेशा आगे बढ़ने और बड़े सपने देखने की प्रेरणा दी।

मां बनीं सबसे बड़ी ताकत

दीपशिखा कहती हैं, “पिता के निधन के बाद मां के सामने दो रास्ते थे— हालात के सामने हार मान लेना या फिर फीनिक्स पक्षी की तरह राख से उठकर नई शुरुआत करना। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।” वह आगे कहती हैं, “मेरी मां ने हमें सिर्फ जीवित रहना नहीं सिखाया, बल्कि ऊंची उड़ान भरना सिखाया। उनके संघर्ष और त्याग ने मुझे यह एहसास कराया कि जीवन में सीमाएं केवल वही होती हैं, जिन्हें हम स्वीकार कर लेते हैं।”

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में बनाई पहचान

पैराकैनो जैसे क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम रही है। इसके बावजूद दीपशिखा ने चुनौतियों का सामना करते हुए इस क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। लगातार अध्ययन, प्रशिक्षण और व्यावसायिक दक्षता के दम पर उन्होंने वह मुकाम हासिल किया, जो आज एशिया की कई युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।

समाज के लिए भी कर रहीं काम

डॉ. दीपशिखा ने 'शक्ति-स्पोर्ट 2026' और 'मदर-लेन लेगेसी' जैसी पहलों की भी शुरुआत की है। इनका उद्देश्य महिलाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों को खेलों में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराना है।

ओलंपिक और पैरालंपिक पर नजर

वर्तमान में डॉ. दीपशिखा का फोकस आगामी ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों पर है। उनका मानना है कि भारतीय पैरा खिलाड़ियों, महिला कोचों, क्लासिफायरों और खेल प्रशासकों को वैश्विक मंच पर उचित स्थान मिलना चाहिए। वह कहती हैं, “मैं चाहती हूं कि किसी छोटे शहर या गांव में बड़ी हो रही हर लड़की यह विश्वास करे कि सफलता की मेज पर उसके लिए भी एक स्थान सुरक्षित है। उसका साधारण पृष्ठभूमि से होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है।” डॉ. दीपशिखा बेनीवाल की कहानी यह साबित करती है कि कठिन परिस्थितियां सफलता की राह में बाधा नहीं, बल्कि मजबूत इरादों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं।