बाल साहित्यिक पत्रिकाएँ बच्चों तक नहीं पहुँचतीं, आखिर दोष किसका है ?
- डॉ. सत्यवान सौरभ
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के हाथों में होता है और बच्चों का भविष्य उनकी शिक्षा, संस्कार तथा कल्पनाशक्ति पर निर्भर करता है। यही कारण है कि बाल साहित्य को किसी भी सभ्य समाज की सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। बाल साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि वह बच्चे के व्यक्तित्व, भाषा, संवेदना, नैतिकता, कल्पना और चिंतन को आकार देने का कार्य करता है। कहानियाँ, कविताएँ, बालगीत, पहेलियाँ, चित्रकथाएँ और बाल पत्रिकाएँ बच्चों के भीतर जिज्ञासा और सृजनशीलता का विकास करती हैं।
विडंबना यह है कि आज उत्कृष्ट बाल साहित्य लिखा भी जा रहा है और अनेक प्रतिष्ठित बाल साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से प्रकाशित भी हो रही हैं, फिर भी वे बच्चों तक नहीं पहुँच पा रही हैं। यह एक गंभीर सांस्कृतिक संकट है। जब बाल साहित्य बच्चों तक नहीं पहुँचेगा, तो वह अपने उद्देश्य को कैसे पूरा करेगा? यह प्रश्न केवल प्रकाशकों का नहीं, बल्कि पूरे समाज, शिक्षा व्यवस्था और अभिभावकों का भी है।
आज का बच्चा मोबाइल, इंटरनेट, वीडियो गेम और सोशल मीडिया की दुनिया में अधिक समय बिता रहा है। उसके हाथ में कहानी की पुस्तक या बाल पत्रिका कम और मोबाइल फोन अधिक दिखाई देता है। तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, लेकिन जब वह पुस्तक संस्कृति का स्थान लेने लगे तो चिंता स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से बच्चों के लिए साहित्यिक पत्रिकाएँ उस आकर्षण और पहुँच का निर्माण नहीं कर सकीं, जिसकी आवश्यकता थी।
एक समय था जब नंदन, चंपक, बाल भारती, बालहंस, देवपुत्र, चकमक जैसी पत्रिकाओं का बच्चे बेसब्री से इंतजार करते थे। डाकिया जब पत्रिका लेकर आता था तो बच्चे उत्साह से उसे पढ़ते, चित्र देखते, पहेलियाँ हल करते और अपनी रचनाएँ भेजने का सपना देखते थे। इन पत्रिकाओं ने न जाने कितने लेखकों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और संवेदनशील नागरिकों को तैयार किया। आज वही परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है।
इस समस्या का सबसे बड़ा कारण वितरण व्यवस्था की कमजोरी है। अधिकांश बाल साहित्यिक पत्रिकाएँ सीमित प्रतियों में प्रकाशित होती हैं। वे बड़े शहरों तक तो किसी तरह पहुँच जाती हैं, लेकिन छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों तक नहीं पहुँच पातीं। पुस्तक विक्रेताओं के लिए भी बाल साहित्यिक पत्रिकाएँ लाभ का बड़ा माध्यम नहीं होतीं, इसलिए वे उन्हें मंगाने में विशेष रुचि नहीं दिखाते।
विद्यालयों की भूमिका भी इस संदर्भ में निराशाजनक रही है। अधिकांश सरकारी और निजी विद्यालयों में पुस्तकालय तो हैं, लेकिन उनमें नई बाल साहित्यिक पत्रिकाओं का नियमित आगमन नहीं होता। पुस्तकालय यदि हैं भी तो बच्चों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने का अवसर बहुत कम मिलता है। परीक्षा-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था ने पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त पढ़ने की संस्कृति को लगभग समाप्त कर दिया है।
अभिभावकों की सोच भी बदल गई है। वे बच्चों के लिए महंगे खिलौने, मोबाइल और कोचिंग पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन वर्ष भर की किसी बाल पत्रिका की सदस्यता लेने में रुचि नहीं दिखाते। उन्हें लगता है कि परीक्षा में अंक लाने के लिए केवल पाठ्यपुस्तकें पर्याप्त हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जीवन में सफल होने के लिए केवल अंक नहीं, बल्कि भाषा, कल्पना, संवेदनशीलता और व्यक्तित्व भी आवश्यक हैं।
बाल साहित्य के प्रचार-प्रसार में मीडिया की उदासीनता भी एक कारण है। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर फिल्मों, खेलों और मनोरंजन की भरमार है, लेकिन बाल साहित्य पर चर्चा बहुत कम दिखाई देती है। जब किसी क्षेत्र को पर्याप्त सार्वजनिक स्थान नहीं मिलेगा, तो उसकी लोकप्रियता भी सीमित रह जाएगी।
आज के डिजिटल युग में बाल साहित्यिक पत्रिकाओं को भी समय के साथ बदलने की आवश्यकता है। केवल मुद्रित संस्करण पर्याप्त नहीं हैं। यदि पत्रिकाएँ मोबाइल ऐप, ई-पत्रिका, ऑडियो कहानियाँ, एनिमेटेड कविताएँ और इंटरैक्टिव सामग्री के रूप में बच्चों तक पहुँचें, तो उनकी उपयोगिता और लोकप्रियता दोनों बढ़ सकती हैं। तकनीक को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयोगी बनाया जाना चाहिए।
भाषा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। बच्चों की भाषा सरल, रोचक और संवादात्मक होनी चाहिए। कई बार बाल पत्रिकाओं की सामग्री अत्यधिक उपदेशात्मक या कठिन हो जाती है, जिससे बच्चे उसमें रुचि नहीं लेते। आधुनिक बच्चे की जिज्ञासाओं, विज्ञान, पर्यावरण, अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, खेल, लोककथाओं और समकालीन विषयों को भी रचनात्मक ढंग से शामिल करना आवश्यक है।
सरकारी स्तर पर भी गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। शिक्षा विभाग प्रत्येक विद्यालय के पुस्तकालय में चुनिंदा बाल साहित्यिक पत्रिकाओं की अनिवार्य सदस्यता सुनिश्चित कर सकता है। राष्ट्रीय और राज्य पुस्तकालय योजनाओं में बाल साहित्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि मिड-डे मील बच्चों के शारीरिक पोषण के लिए आवश्यक है, तो बाल साहित्य उनके बौद्धिक और सांस्कृतिक पोषण के लिए उतना ही आवश्यक है।
लेखकों और संपादकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। उन्हें बच्चों के बदलते मनोविज्ञान को समझते हुए ऐसी सामग्री तैयार करनी होगी जो मनोरंजक भी हो और ज्ञानवर्धक भी। बाल साहित्य बच्चों को उपदेश देने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके साथ मित्रवत संवाद का माध्यम होना चाहिए।
समाज में पढ़ने की संस्कृति विकसित करना भी समय की मांग है। परिवार में यदि माता-पिता स्वयं पुस्तकें पढ़ेंगे, तो बच्चे भी पढ़ने के लिए प्रेरित होंगे। विद्यालयों में "एक पीरियड पुस्तकालय के नाम", "मासिक पत्रिका दिवस", "कहानी पाठ", "बाल लेखक से संवाद" और "पुस्तक मित्र अभियान" जैसे कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।
यह भी आवश्यक है कि बाल साहित्य को केवल प्रतियोगिताओं तक सीमित न रखा जाए। बच्चों को पत्रिकाओं में अपनी कविताएँ, कहानियाँ, चित्र और पत्र प्रकाशित कराने के अवसर मिलने चाहिए। जब बच्चा स्वयं किसी पत्रिका का हिस्सा बनता है, तो उसका उससे भावनात्मक संबंध भी मजबूत होता है।
ग्रामीण भारत के संदर्भ में यह आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण है। वहाँ अनेक बच्चों के पास डिजिटल संसाधन सीमित हैं। यदि गुणवत्तापूर्ण बाल पत्रिकाएँ विद्यालयों और पंचायत पुस्तकालयों तक नियमित पहुँचें, तो वे बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।
बाल साहित्य किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करता है। यह बच्चों को केवल भाषा नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने की कला, मानवीय मूल्य, प्रकृति प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सिखाता है। यदि हमारी आने वाली पीढ़ी पुस्तकों और पत्रिकाओं से दूर होती गई, तो उसका प्रभाव केवल साहित्य पर नहीं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक विकास पर भी पड़ेगा।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि बाल साहित्यिक पत्रिकाएँ क्यों प्रकाशित हो रही हैं; प्रश्न यह है कि वे बच्चों तक क्यों नहीं पहुँच रहीं। जब तक लेखक, प्रकाशक, विद्यालय, अभिभावक, सरकार और समाज मिलकर इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक श्रेष्ठ बाल साहित्य सीमित दायरों में ही सिमटा रहेगा।
आज आवश्यकता केवल नई पत्रिकाएँ निकालने की नहीं, बल्कि बच्चों तक उन्हें पहुँचाने की है। क्योंकि जिस दिन हर बच्चे के हाथ में फिर से एक अच्छी बाल साहित्यिक पत्रिका होगी, उसी दिन पढ़ने की संस्कृति, कल्पनाशक्ति और मानवीय संवेदनाएँ भी नए उत्साह के साथ लौटेंगी। यही भविष्य के जागरूक, संवेदनशील और सशक्त भारत की सबसे मजबूत नींव होगी।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
