लेखन हुआ गुलाम

 
लेखन हुआ गुलाम

लेखक से ही माँगते, पुस्तक छपने दाम।

फिर लेखक से  कह रहे, पाठक जुटें तमाम॥

लेखक लेखक पढ़ रहे, लेखक ही गुणगान।

पाठक जी तो दूर हैं, किसको है पहचान॥

छपवाकर अपना लिखा, खुद ही करो प्रचार।

स्वयं खरीदो पुस्तकें, कैसा कारोबार॥

भीड़ विमोचन में जुटी, फोटो में सम्मान।

घर पहुँचते ही खत्म है, लेखक की पहचान॥

पुस्तक छपने से मिला, लेखक को विश्वास।

बिकने की जब बात हो, प्रकाशक है निराश॥

लेखक से खर्चा लिया, फिर माँगा सहयोग।

पाठक ढूँढ़ो आप ही, यही प्रकाशक-योग॥

मंचों पर साहित्य है, भाषण में सद्भाव।

पुस्तक बिकती क्यों नहीं, किसको इसका भाव॥

कितनी पुस्तक छप गई, कितने बिके विचार।

लेखक गिनता जिल्द को, पाठक गिनता सार॥

सम्मानों की होड़ में, लेखन हुआ गुलाम।

जेब भरे बाजार की, लेखक है बदनाम॥

लेखक को बाजार ने, ऐसा दिया उधार।

नाम हुआ अखबार में, जेब हुई लाचार॥

शब्दों की मंडी सजी, बिकते झूठे ख्वाब।

सच्चा लेखक पूछता, पाठक कहाँ जनाब॥

साहित्य सेवा के तले, छिपा हुआ व्यापार।

लेखक की मजबूरियाँ, बनतीं लाभ अपार॥

लेखक ने जीवन दिया, शब्दों को आकार।

बाजारों में बिक रहा, उसका ही किरदार॥

कागज पर सपने लिखे, मन में रखकर आस।

पाठक बिन लेखक हुआ, खुद से आज उदास॥

विमोचन के बाद फिर, पुस्तक हुई उदास।

पाठक तक पहुँचे नहीं, लेखक की हर आस॥

पुस्तक का संसार अब, बाजारों के संग।

ज्ञान कहीं पीछे हुआ, आगे दिखता रंग॥

प्रकाशक का व्यापार है, लेखक का अरमान।

पाठक की चिंता करे, ऐसा मिले सुजान॥

पुस्तक मेले सज रहे, चमक रहे बाजार।

पाठक फिर भी खोजते, मन के सत्य विचार॥

पुस्तक पढ़ने से मिले, सोच नई हर बार।

पाठक ही साहित्य का, सच्चा पालनहार॥

लेखक-पाठक का रहे, रिश्ता सदा महान।

शब्दों से जीवित रहे, संस्कृति और' इंसान॥

 डॉ. प्रियंका सौरभ