जनता के अधिकार पर, मंडराता अंधकार।
मत की चोरी रोकना, लोकतंत्र का सार।।
आरोपों के दौर में, उठते कई सवाल।
सच क्या है, यह सामने, आए अब हर हाल।।
जनता के मत पर जो, डाले अपनी घात।
लोकतंत्र की पीठ पर, करता है आघात।।
कुर्सी की खातिर यहाँ, बिकने लगे उसूल।
सत्ता मिलते ही हुए, सारे वादे धूल।।
मतदाता को भूलकर, सत्ता में मदमस्त।
जनता जागी एक दिन, सिंहासन हो ध्वस्त।।
जनता के अधिकार को, समझा जिसने माल।
वक्त पड़ेगा एक दिन, होगा उसका हाल।।
मत की चोरी हो अगर, चुप मत रहना आज।
लोकतंत्र की नींव पर, होता गहरा आघात।।
मत का सौदा जो करे, उससे पूछो बात।
जनता के अधिकार की, सौरभ ये है मात।।
चेहरे पर मुस्कान है, भीतर काला खेल।
जनता के विश्वास से, करे रोज़ ही खेल।।
सत्ता के गलियार में, गूँजे झूठे बोल।
जनता के हर प्रश्न का, कौन चुकाए मोल।।
लोकतंत्र के नाम पर, होता जब व्यापार।
जनता के विश्वास पर, होता सीधा वार।।
जनादेश के नाम पर, मत करना व्यापार।
जनता के विश्वास का, रखिए सदा विचार।।
मत की ताकत कम नहीं, मत समझो कमजोर।
एक-एक मत बदलता, सत्ता का हर दौर।।
झूठे दावों से कभी, सच सके नहीं हार।
जनता जब जागे तभी, खुलता पूरा सार।।
मतपेटी की पवित्रता, रखिए सदा महान।
इसमें जनता की बसी, आशा और' अरमान।।
सत्ता चाहे जो मिले, मत का रखिए मान।
जनता के अधिकार से, ऊँचा नहीं विधान।।
आरोपों का दौर है, चारों ओर सवाल।
निष्पक्ष जांच ही करे, सही खुलासा हर हाल।।
देश-विरोधी शक्तियाँ, करतीं अपना काम।
जनता के विश्वास को, करतीं है बदनाम।।
लोकतंत्र की नींव में, जनता का विश्वास।
इसको चोट लगी अगर, कैसे बचे विकास।।
जनता जागे अब यही, सौरभ समय पुकार।
मत की रक्षा से बने, लोकतंत्र दमदार।।
-डॉ. सत्यवान सौरभ
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
