बाड़ खेत को खा रही

 
बाड़ खेत को खा रही

 

जनता के अधिकार पर, भारी सत्ता-तंत्र।

कहने को तो देश में, है आज लोकतंत्र।।

कुर्सी की खातिर यहाँ, रिश्ते हुए तमाम।

नीति गई है ताक पर, बाकी केवल नाम।।

नेता जनता से कहें, हम हैं तेरे साथ।

सत्ता मिलते ही मगर, बदल गई औकात।।

भूखी जनता पूछती, कब बदलेगा हाल।

भाषण में खुशहाल जो, धरती पर कंगाल।।

सच बोलो तो हो गया, मुश्किल अपना काम।

झूठ सजाकर बेचते, नेता अपना नाम।।

लोकतंत्र की देह पर, स्वार्थों के हैं घाव।

जनता फिर भी ढूँढ़ती, उम्मीदों की छाँव।।

सत्ता जब मद में चढ़े, भूले नीति-विचार।

जनता के प्रश्नों सदा, करते आँखें चार।।

महँगाई की मार से, जनता हुई बेहाल।

मंचों पर उत्सव मगर, भाषण मालामाल।।

जनता जागे, देश का, तभी सुधरेगा हाल।

मत की ताकत समझकर, चुने सही रखवाल।।

बाड़ खेत को खा रही, कौन बने रखवाल।

जनता जागेगी तभी, बदलेगी बदहाल।।

-डॉ. सत्यवान सौरभ

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)