महँगाई की आग और रेपो रेट का ब्रेक
रेपो रेट की बढ़ोतरी: महँगाई पर लगाम, लेकिन विकास की कीमत पर नहीं
— डॉ. सत्यवान सौरभ
मौद्रिक नीति का यह औजार मांग को नियंत्रित कर कीमतों पर दबाव घटाता है, पर भारत जैसी अर्थव्यवस्था में खाद्य और ईंधन की महँगाई से निपटने के लिए आपूर्ति-पक्ष के उपाय भी जरूरी
महँगाई किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए केवल बढ़ती कीमतों का सवाल नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक की क्रयशक्ति, बचत, निवेश और जीवन-स्तर को सीधे प्रभावित करती है। जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो समान आय में परिवार पहले की तुलना में कम वस्तुएँ खरीद पाते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की होती है। इसी उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर रेपो रेट में बदलाव करता है।
रेपो रेट वह दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से धन लेना महँगा हो जाता है। इसका असर धीरे-धीरे बैंक ऋण की ब्याज दरों पर पड़ता है और घरों तथा व्यवसायों के लिए कर्ज लेना महँगा हो सकता है। यही प्रक्रिया अर्थव्यवस्था में मांग को नियंत्रित करने और मांग-जनित महँगाई को कम करने में मदद करती है।
रेपो रेट बढ़ने का सबसे सीधा प्रभाव ऋण की लागत पर पड़ता है। यदि गृह ऋण, वाहन ऋण या व्यक्तिगत ऋण महँगे होते हैं, तो उपभोक्ता नए कर्ज लेने या बड़ी खरीदारी करने से बच सकते हैं। मौजूदा ऋण लेने वालों की ईएमआई भी बढ़ सकती है, जिससे उनकी मासिक आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है। परिणामस्वरूप उनके पास गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करने के लिए कम धन बचता है। उपभोग में यह कमी कुल मांग को नियंत्रित करती है और मांग के अत्यधिक दबाव से पैदा होने वाली महँगाई को कम करने में मदद करती है।
इसका प्रभाव केवल परिवारों तक सीमित नहीं रहता। कंपनियाँ भी बैंक ऋण के माध्यम से नए कारखाने, मशीनरी, भवन और कारोबारी परियोजनाएँ शुरू करती हैं। ब्याज दर बढ़ने पर परियोजनाओं की वित्तीय लागत बढ़ जाती है। कई कंपनियाँ ऐसे निवेश को कुछ समय के लिए टाल सकती हैं, जिनसे अपेक्षित लाभ ब्याज लागत की तुलना में कम हो। इससे अत्यधिक आर्थिक गतिविधि पर कुछ नियंत्रण आता है और अर्थव्यवस्था में मांग का दबाव कम हो सकता है।
रेपो रेट का एक महत्वपूर्ण प्रभाव बैंकिंग प्रणाली में ऋण वृद्धि पर भी पड़ता है। महँगे ऋण के कारण बैंक ऋण की मांग घट सकती है। यदि अर्थव्यवस्था में कर्ज बहुत तेजी से बढ़ रहा हो और उसके कारण उपभोग तथा निवेश असामान्य रूप से बढ़ रहे हों, तो मौद्रिक सख्ती उस गति को संतुलित करने का काम करती है।
महँगाई केवल वर्तमान कीमतों का विषय नहीं है; भविष्य में कीमतें कितनी बढ़ेंगी, इसकी लोगों की धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। जब आरबीआई महँगाई के दबाव के बीच रेपो रेट बढ़ाता है, तो वह बाजार को यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। इससे महँगाई की अपेक्षाओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। यदि व्यवसायों और उपभोक्ताओं को विश्वास हो कि केंद्रीय बैंक कीमतों को अनियंत्रित नहीं होने देगा, तो वे भविष्य की कीमतों और मजदूरी को लेकर अत्यधिक मुद्रास्फीतिकारी निर्णय लेने से बच सकते हैं।
रेपो रेट में बढ़ोतरी का एक अन्य संभावित प्रभाव रुपये की विनिमय दर पर पड़ सकता है। अपेक्षाकृत ऊँची घरेलू ब्याज दरें वित्तीय परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बना सकती हैं और पूँजी प्रवाह को समर्थन मिल सकता है। इससे रुपये पर अत्यधिक अवमूल्यन का दबाव कम हो सकता है। भारत कच्चे तेल सहित कई महत्वपूर्ण वस्तुओं का आयात करता है। रुपये की कमजोरी से आयात महँगा होता है और इससे आयातित महँगाई बढ़ सकती है। इसलिए विनिमय दर में स्थिरता भी महँगाई नियंत्रण में अप्रत्यक्ष भूमिका निभा सकती है।
हालाँकि, रेपो रेट बढ़ाना कोई ऐसा उपाय नहीं है जिसका अर्थव्यवस्था पर केवल सकारात्मक प्रभाव पड़े। इसका सबसे बड़ा जोखिम आर्थिक विकास की गति पर पड़ सकता है। ऊँची ब्याज दरों से परिवारों का खर्च घट सकता है और कंपनियों का निवेश धीमा हो सकता है। इसका प्रभाव आवास, ऑटोमोबाइल, निर्माण और अन्य ब्याज-संवेदनशील क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है। छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए यह चुनौती और गंभीर हो सकती है, क्योंकि वे अक्सर बैंक ऋण पर अधिक निर्भर होते हैं।
दूसरी ओर, बचतकर्ताओं को बढ़ी हुई ब्याज दरों से कुछ लाभ मिल सकता है। बैंकों द्वारा जमा पर अधिक ब्याज दिए जाने की स्थिति में सावधि जमा और अन्य बचत साधनों का आकर्षण बढ़ सकता है। इससे उपभोग की बजाय बचत को प्रोत्साहन मिलता है, जो अत्यधिक मांग को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है।
लेकिन भारत में महँगाई का बड़ा हिस्सा हमेशा मांग से पैदा नहीं होता। खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि, खराब मानसून, आपूर्ति बाधाएँ, वैश्विक जिंस कीमतों में उछाल, कच्चे तेल की कीमत और भू-राजनीतिक संकट जैसी परिस्थितियाँ आपूर्ति-पक्ष की महँगाई पैदा कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में केवल रेपो रेट बढ़ाने से समस्या का मूल समाधान नहीं होता। उदाहरण के लिए, यदि प्याज या टमाटर की कीमत आपूर्ति कम होने के कारण बढ़ रही है, तो ब्याज दर बढ़ाने से इनकी आपूर्ति तत्काल नहीं बढ़ेगी।
इसलिए भारत में महँगाई नियंत्रण की रणनीति बहुआयामी होनी चाहिए। आरबीआई को महँगाई और आर्थिक विकास के बदलते संकेतकों के आधार पर रेपो रेट में सावधानीपूर्वक बदलाव करना चाहिए। सरकार को खाद्य भंडारण, कृषि आपूर्ति श्रृंखला, परिवहन, आयात-निर्यात प्रबंधन और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुधारने पर समान रूप से ध्यान देना होगा। ऊर्जा सुरक्षा के लिए कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाना भी महत्वपूर्ण है।
महँगाई और विकास के बीच संतुलन ही मौद्रिक नीति की असली परीक्षा है। बहुत कम ब्याज दरें लंबे समय तक बनी रहें तो अत्यधिक मांग और संपत्ति मूल्यों में असंतुलन पैदा हो सकता है, जबकि अत्यधिक ऊँची दरें आर्थिक गतिविधियों और रोजगार पर दबाव डाल सकती हैं। इसलिए रेपो रेट को महँगाई के खिलाफ एकमात्र हथियार के बजाय व्यापक आर्थिक नीति के एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में देखना चाहिए।
अंततः रेपो रेट में बढ़ोतरी मांग-जनित महँगाई को नियंत्रित करने, ऋण वृद्धि की गति कम करने और महँगाई की अपेक्षाओं को स्थिर करने में प्रभावी हो सकती है। लेकिन भारत जैसी विशाल और विविध अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता केवल ब्याज दरों से हासिल नहीं की जा सकती। मौद्रिक नीति के साथ प्रभावी राजकोषीय नीति, बेहतर आपूर्ति प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा विविधीकरण और स्पष्ट नीतिगत संवाद आवश्यक हैं। महँगाई पर लगाम ऐसी होनी चाहिए कि कीमतों का दबाव भी कम हो और विकास का पहिया भी अनावश्यक रूप से धीमा न पड़े।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
