कैसे-कैसे खेल

 
कैसे-कैसे खेल

 

डॉ. सत्यवान सौरभ

समय समय के खेल में, कैसे-कैसे खेल।
कहीं खुशी के दीप हैं, कहीं विरह की बेल॥

रिश्तों में दिखने लगे, कैसे-कैसे खेल।
मतलब पूरा हो गया, टूट गया फिर मेल॥

किस्मत भी दिखला रही, कैसे-कैसे खेल।
कभी मुकुट सिर पर धरे, कभी कसती नकेल॥

प्रेम नगर में चल रहे, कैसे-कैसे खेल।
मन में कोई और है, मुख पर दूजा मेल॥

झूठे वादे कर रहे, कैसे-कैसे खेल।
जनता को बहला रहे, नेता बनकर बेल॥

धन-दौलत के फेर में, कैसे-कैसे खेल।
भाई-भाई लड़ पड़े, टूट गया सब मेल॥

सत्ता के गलियार में, कैसे-कैसे खेल।
कुर्सी खातिर कर रहे, साँप नेवले मेल॥

कर्मों का परिणाम भी, कैसे-कैसे खेल।
जैसी बोई थी कभी, वैसी काटे बेल॥

जीवन की चौपड़ बिछी, कैसे-कैसे खेल।
कोई जीते बाजियाँ, कोई खाए झेल॥

चेहरे बदल रहे यहाँ, कैसे-कैसे खेल।
कल तक जो थे साथ में, आज हुए बेमेल॥

वक्त दिखाता है सदा, कैसे-कैसे खेल।
राजा को रँक दे बना, रँक को राजा मेल॥

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)