दीवाली से पहले का वनवास

 
दीवाली से पहले का वनवास

कभी अँधेरा ज़्यादा गहराने लगे,
तो मत समझना कि सूरज सो गया है।
हर दीये के जलने से पहले,
कुछ तेल तो खर्च हुआ है।

जब भी लगे कि अब थक गए हो,
ज़रा अपने सपनों को याद करो।
जो रात सबसे अँधेरी लगती है,
वही नई सुबह का वादा करती है।

राम को भी चौदह बरस लगे थे,
अयोध्या लौटकर दीप जलाने में।
तो तुम क्यों डरते हो कुछ साल,
अपने सपनों को पाने में?

हर गिरना, उठने की तैयारी है,
हर हार, जीत की जिम्मेदारी है।
ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती,
पर खूबसूरत भी वही होती है।

जो साथ चले, वही सच्चा होता है,
जो अँधेरे में भी रोशनी ढूँढ़े,
वही अपना होता है।
सीता-सा विश्वास रखो,
लक्ष्मण-सा साहस रखो,
राम-सा धैर्य रखो,
फिर हर वनवास भी तुम्हारा उत्सव बनेगा।

क्योंकि दीवाली तभी तो चमकती है,
जब दिल ने अँधेरों को हराया हो,
और रोशनी ने कहना सीखा हो
"मैं डर के बाद भी आया हूँ।"