ज्यादा बेसिक-पे या मासिक भत्ते जानिए 8वें वेतन आयोग में किससे मिलेगा कर्मचारियों को ज्यादा फायदा ?
8th Pay Commission : 8वें वेतन आयोग ने हाल ही में 23 अक्टूबर को मुंबई में अपनी एक महत्वपूर्ण बैठक पूरी की। पिछले कुछ महीनों में, जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने दिल्ली, लद्दाख, कोलकाता और बेंगलुरु सहित कई प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कई बैठकें की हैं।
3 सदस्यीय पैनल की अंतिम सिफारिशों का बेसब्री से इंतजार
कई प्रमुख यूनियनों और संघों ने 8वें वेतन आयोग से मांग की है कि वे महंगाई भत्ता (DA), महंगाई राहत (DR) और मूल वेतन (basic pay) के मामले में सार्थक सुधार करें, ताकि कार्यरत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाली राशि में उचित वृद्धि हो सके। इसी तरह, एक और अहम मांग जो काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, वह है महंगाई भत्ते (DA) को मूल वेतन में मिलाना (merger)। केंद्र सरकार के कार्यरत कर्मचारी और पेंशनभोगी, 8वें वेतन आयोग के 3 सदस्यीय पैनल की अंतिम सिफारिशों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग
इसलिए, कर्मचारी यूनियनें मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रही हैं, ताकि कार्यरत कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई का सामना करने में मदद मिल सके। इन बदलावों में एक निश्चित महंगाई स्तर पर DA को मूल वेतन में मिलाना (उदाहरण के लिए, यदि मंजूरी मिलती है तो DA के 40% या 50% तक पहुंचने पर) और भत्ता तय करने वाले फॉर्मूले में संशोधन करना शामिल है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि पिछले वेतन आयोगों के फैसलों से पता चलता है कि DA का मूल वेतन में विलय (merger) अपने आप नहीं हो जाता। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि पिछले वेतन आयोगों ने DA के विलय को लेकर क्या रुख अपनाया था और यूनियनें तथा संघ 8वें वेतन आयोग से असल में क्या मांग कर रहे हैं।
5वें, 6वें और 7वें वेतन आयोगों ने DA के विलय को लेकर क्या रुख अपनाया था?
5वें वेतन आयोग ने सिफारिश की थी कि जब भी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधार सूचकांक (base index) से 50% बढ़ जाए, तो DA को 'महंगाई वेतन' (dearness pay) में बदल दिया जाए। इस 'महंगाई वेतन' को सेवानिवृत्ति लाभों (retirement benefits) सहित सभी उद्देश्यों के लिए गिना जाना था। आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि सभी वेतन स्तरों के कर्मचारियों के लिए DA के जरिए महंगाई की 100% भरपाई (neutralisation) की जानी चाहिए।
दूसरी ओर, 6वें वेतन आयोग ने एक अलग दृष्टिकोण अपनाया; उसने किसी भी स्तर पर DA को मूल वेतन में मिलाने (merger) से इनकार कर दिया। आयोग का तर्क था कि संशोधित वेतन ढांचे में पहले से ही ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत कीमतों में बदलाव के आधार पर भत्तों और लाभों में समय-समय पर संशोधन किया जा सकता है। इसने तिमाही संशोधन की सिफारिश करने के बजाय, रणनीतिक रूप से साल में दो बार DA (महंगाई भत्ता) संशोधन के शेड्यूल को ही बनाए रखा।
अंत में, हाल ही के 7वें वेतन आयोग ने DA की मौजूदा गणना पद्धति को ही जारी रखा। आयोग का कहना था कि यह फॉर्मूला पिछले कई वर्षों से काफी प्रभावी रहा है। इसने पूरी कार्यप्रणाली और गणना के तरीके में किसी बड़े या व्यापक बदलाव की सिफारिश नहीं की।
8वें वेतन आयोग से कर्मचारी क्या उम्मीद कर रहे हैं?
कई प्रमुख कर्मचारी यूनियनों, संघों और पेंशनभोगी संगठनों ने इन महत्वपूर्ण पैमानों (metrics) में सकारात्मक बदलाव की अपनी मांगें फिर से उठाई हैं। उदाहरण के लिए, 'फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स' (FNPO) ने मांग की है कि जब DA 25% से अधिक हो जाए, तो इसे मूल वेतन (basic pay) में मिला दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा, 'भारत पेंशनर्स समाज' ने साल में दो बार के बजाय हर तिमाही में DA और महंगाई राहत (DR) में संशोधन करने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि एक निश्चित सीमा पार करने पर DR को मूल पेंशन (basic pension) में मिला दिया जाना चाहिए।
इसी तरह, अन्य संगठनों ने यह सुझाव भी दिया है कि 'ऑल-इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स' (AICPI-IW) की गणना पद्धति का बारीकी से विश्लेषण और समीक्षा की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि इसमें घरेलू खर्चों और सरकारी कर्मचारियों के उपभोग के तरीकों (consumption patterns) को बेहतर ढंग से दर्शाया जाना चाहिए।
इन मांगों का 8वें वेतन आयोग के पैनल के फैसलों पर क्या असर पड़ेगा?
न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला 8वें वेतन आयोग का 3-सदस्यीय पैनल, अपनी अंतिम सिफारिशें तैयार करते समय इन प्रमुख यूनियनों की मांगों और सुझावों पर गंभीरता से विचार करेगा।
फिलहाल, DA को मूल वेतन में मिलाने, गणना के फॉर्मूले में बदलाव और इसे लागू करने के समय को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। इसलिए, जब तक केंद्र सरकार कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेती, तब तक केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को यूनियनों के इन प्रस्तावों को केवल 'मांग' के रूप में ही देखना चाहिए, न कि पक्के या तय लाभ के रूप में।
