हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC)  द्वारा प्रॉसिक्यूशन विभाग के लिए चयनित 245 असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) के पदनाम और विभाग पर गंभीर सवाल

 

 
हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC)  द्वारा प्रॉसिक्यूशन विभाग के लिए चयनित 245 असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) के पदनाम और विभाग पर गंभीर सवाल   

50 वर्ष पूर्व 1976 में देश की संसद ने एडवोकेट्स अधिनियम में संशोधन कर पूर्णतया हटा दिया था ‘अटॉर्नी’ शब्द हालांकि हरियाणा में नियमित सरकारी वकीलों के सेवा नियमों में आज तक इसका उल्लेख – एडवोकेट हेमंत

हरियाणा सरकार कार्य (आबंटन) नियमावली में प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन) कोई विभाग नहीं बल्कि प्रदेश के गृह विभाग के अधीन एक निदेशालय (डायरेक्टरेट)

चंडीगढ़ – हाल ही में  22 अक्टूबर को   हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) द्वारा प्रदेश के प्रॉसिक्यूशन विभाग के लिए  असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) अर्थात सहायक जिला न्यायवादी की चयन-प्रकिया का  फाइनल परिणाम (रिजल्ट) घोषित कर दिया गया जिसमें कुल विज्ञापित  255 पदों में से 245  के लिए चयन किया गया है जबकि शेष  10 पद  अदालत में लंबित याचिकाओं  के दृष्टिगत फिलहाल रिक्त रखे गये  है. ध्यान देने योग्य है कि 22 अक्टूबर को ही एच.पी.एस.सी. के निवर्तमान चेयरमैन आलोक वर्मा का 6 वर्ष कार्यकाल को पूरा हुआ था.

 

इसी बीच हरियाणा सरकार की सेवा में नियमित तौर तौर पर नियुक्त होने वाले  सरकारी वकीलों  के पदनाम में अटॉर्नी (न्यायवादी) के प्रयोग पर और उनके विभाग अर्थात  प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन) डिपार्टमेंट पर गंभीर विवाद आज भी कायम है ।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट  और कानूनी-प्रशासनिक मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने बताया कि देश की  संसद ने आज से 50 वर्ष पूर्व  1976 में अधिवक्ता अधिनियम (एडवोकेट्स एक्ट), 1961 में संशोधन कर  अटॉर्नी शब्द को उसमें से पूर्णतया  हटा दिया था.

हालांकि आज तक  हरियाणा सरकार की  अभियोजन  विधिक सेवा (प्रॉसिक्यूशन लीगल सर्विस) के सेवा नियमों में अटॉर्नी  शब्द का  प्रयोग बे-रोकटोक किया जा  रहा है. हरियाणा अभियोजन विधिक सेवा (ग्रुप-बी) सेवा नियम, 2001 में असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) तथा ग्रुप-ए सेवा नियम, 2013 में डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (DA) और डिप्टी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (DDA) के  पद शामिल हैं.

 

हेमंत ने इस मामले में हरियाणा के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, गृह सचिव, एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता), विधि परामर्शी (एल.आर.) और निदेशक अभियोजन सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजकर पदनामों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने और सेवा नियमों की समीक्षा करने की अपील की हालांकि आज तक जवाब लंबित है.

हेमंत का कानूनी  तर्क है कि हरियाणा  सरकार के सेवा नियम देश की संसद द्वारा बनाए गए केंद्रीय कानून के अनुरूप होने चाहिए । इसलिए उक्त  पदनामों में प्रयुक्त ‘अटॉर्नी’ शब्द की कानूनी स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किए जाना चाहिए.

हेमंत का कहना है कि संसद द्वारा 1976 में अधिवक्ता अधिनियम में किए गए संशोधन के बाद वकालत के पेशे में मान्य श्रेणियां केवल  एडवोकेट और सीनियर एडवोकेट हैं। उनके अनुसार, इसी कानूनी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार के नियमित विधि अधिकारियों के पदनामों की समीक्षा आवश्यक है।

 

नोटिस में एक और महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू भी उठाया गया है। हरियाणा सरकार द्वारा ए.डी.ए., डी.डी.ए. और डी.ए. की नियमित सेवा में नियुक्ति के बाद उन्हें सरकारी वकील के तौर पर  सिविल मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता (सी.पी.सी.), 1908 के तहत गवर्नमेंट प्लीडर-जी.पी. (Government Pleader-G.P.) और आपराधिक मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एन.एस.), 2023 के तहत पब्लिक प्रॉसीक्यूटर-पी.पी. (Public Prosecutor-PP) के तौर पर पदांकित करने बारे ही प्रदेश के गृह सचिव द्वारा  गजट नोटिफिकेशन प्रकाशित  की जाती है. प्रदेश के सिविल और क्रिमिनल अदालतों में रोजमर्रा इन सरकारी वकीलों के  पदनाम  के जी.पी. तथा पी.पी. शब्द का ही प्रोयोग होता  है हालांकि  सेवा नियमों में ए.डी.ए., डी.डी.ए. और डी.ए. जैसे पदनाम हैं। इसी अंतर को आधार बनाकर उन्होंने राज्य सरकार से स्पष्ट करने की मांग की है कि सेवा नियमों में मौजूद  पदनामों का वर्तमान केंद्रीय कानूनों के साथ क्या संबंध है और इनकी क्या आवश्यकता है।

हेमंत ने अपने नोटिस में केंद्र सरकार में कार्यरत  विधि अधिकारियों  के पदनामों का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, लॉ ऑफिसर, लीगल एडवाइजर, गवर्नमेंट काउंसल जैसे पदनाम सरकारी विधि व्यवस्था में इस्तेमाल होते हैं।

हेमंत ने  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट स्थित हरियाणा के एडवोकेट जनरल कार्यालय में प्रचलित पदनामों—सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल, एडिशनल एडवोकेट जनरल, सीनियर डिप्टी एडवोकेट जनरल, डिप्टी एडवोकेट जनरल और असिस्टेंट एडवोकेट जनरल—का भी हवाला दिया है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हरियाणा लॉ ऑफिसर्स (एंगेजमेंट) अधिनियम, 2016 में भी ‘अटॉर्नी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।

नोटिस में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 का उल्लेख करते हुए लिखा  गया है कि उसमें केवल   भारत का  महान्यायवादी (Attorney General for India) के संवैधानिक पद का ही प्रावधान है जो भारत सरकार का पहले लॉ ऑफिसर होता है एवं जिसकी योग्यता सुप्रीम कोर्ट का  जज बनने लायक होती है. इसके अतिरिक्त देश एवं प्रदेश में किसी सरकारी वकील में अटॉर्नी शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता है.

 

हेमंत ने हरियाणा सरकार से मांग की है कि राज्य अभियोजन विधिक सेवा के ग्रुप-ए और ग्रुप-बी सेवा नियमों की समीक्षा की जाए तथा जरूरत के अनुसार ‘अटॉर्नी’ शब्द हटाकर गवर्नमेंट एडवोकेट, गवर्नमेंट काउंसल अथवा  लॉ ऑफिसर जैसे उपयुक्त पदनाम अपनाए जाएं।

 

इसी बीच हेमंत ने एक और रोचक परन्तु महत्वपूर्ण पॉइंट उठाते हुए बताया कि हरियाणा सरकार कार्य (आबंटन) नियम, 1974, जो संविधान के अनुच्छेद 166(3) के तहत बनाए गए हैं, के भीतर प्रदेश  सरकार के सभी विभागों का विधिक आधार हैं। इन नियमों में कहीं भी प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन) विभाग के  नाम का कोई उल्लेख  नहीं है। वास्तव में प्रॉसिक्यूशन एक स्वतंत्र विभाग नहीं, बल्कि गृह विभाग के अधीन कार्यरत "डायरेक्टरेट ऑफ प्रॉसिक्यूशन" (अभियोजन निदेशालय) है। वर्ष 2025 से पहले यह न्याय-प्रशासन(एडमिनिस्ट्रेशन ओफ्जुस्तिस)  विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में था। इसलिए इसे विभाग नहीं बल्कि निदेशालय कहना ही विधिक और प्रशासनिक दृष्टि से सही है।

 

हेमंत ने देश की  संसद द्वारा पारित एवं 1 जुलाई 2024 से देश भर में लागू  भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 20 का भी उल्लेख किया  है। इसमें प्रत्येक राज्य में डायरेक्टरेट ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन  स्थापित करने का ही प्रावधान है। बी.एन.एस.एस., 2023 से पूर्व लागू दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 25A में भी प्रॉसिक्यूशन निदेशालय का ही उल्लेख था।

हेमंत का तर्क है कि जब संसद द्वारा बी.एन.एस.एस.,2023 कानून में डायरेक्टरेट ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन  शब्द का प्रयोग किया गया है, तब हरियाणा सरकार और एच.पी.एस.सी.  द्वारा प्रॉसिक्यूशन विभाग  लिखना मौजूदा कानूनी  व्यवस्था के विपरीत है।

 

इस वर्ष फरवरी में यह मुद्दा उठाने पर हरियाणा के निदेशक, अभियोजन द्वारा इस विषय पर   भेजे पत्र में वर्ष 1981 के एक सरकारी आदेश का हवाला देकर "प्रॉसिक्यूशन विभाग" शब्द को उचित ठहराने का प्रयास किया था। हेमंत का कहना है कि कोई भी सरकारी  आदेश संविधान के अनुच्छेद 166 के तहत बनाए गए कार्य आबंटन नियमों में संशोधन नहीं कर सकता। यदि प्रदेश सरकार में  कोई नया विभाग बनाना है, किसी मौजूदा  विभाग का नाम बदलना है  अथवा विभागों का पुनर्गठन करना है,  तो उसके लिए कार्य आबंटन नियमों में विधिवत संशोधन अनिवार्य है।

 

बहरहाल, तीन महीने पूर्व  30 जुलाई को हरियाणा के अकाउंटेंट जनरल- ए एंड ई. (प्रधान महालेखाकार) (लेखा एवं हकदारी) ने इस पूरे मामले को आगामी  कार्रवाई के लिए प्रदेश के प्रधान महालेखाकार (ऑडिट) को स्थानांतरित कर दिया है।

हेमंत का कहना है कि उपरोक्त मामला केवल शब्दों का विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन, प्रशासनिक जवाबदेही और विधि के शासन का प्रश्न है। उनके अनुसार न केवल  हाल ही एच.पी.एस.सी. द्वारा चयनित 245 ए.डी.ए. को और साथ साथ हरियाणा सरकार में मौजूदा तौर पर सेवारत डी.ए., डी.डी.ए और ए.डी.ए. को बल्कि हर हरियाणा निवासी को   सही जानकारी होनी  चाहिए कि प्रदेश के सरकारी वकीलों के  पदनाम में अटॉर्नी (न्यायवादी) शब्द का प्रयोग देश की संसद द्वारा 50 वर्ष पूर्व  1976 में एडवोकेट्स अधिनियम में किये संशोधन का स्पष्ट उल्लंघन है. इसी प्रकार   हरियाणा में कानूनी और आधिकारिक तौर पर प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन) कोई  विभाग नहीं बल्कि  हरियाणा के गृह विभाग के अंतर्गत निदेशालय (डायरेक्टरेट) है.