जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र में जन्म लेंगे कान्हा:आज गृहस्थ का व्रत-पूजन, वैष्णव कल मनाएंगे नंदोत्सव

 
जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र में जन्म लेंगे कान्हा:आज गृहस्थ का व्रत-पूजन, वैष्णव कल मनाएंगे नंदोत्सव

 

इस बार जन्माष्टमी पर कान्हा रोहिणी नक्षत्र में जन्म लेंगे। आज 4 सितंबर को जन्माष्टमी पर चंद्रमा वृषभ राशि में और रोहिणी नक्षत्र में रहेगा। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से रोहिणी नक्षत्र का खास संबंध माना जाता है, इसलिए इस बार जन्माष्टमी का यह संयोग श्रद्धालुओं के लिए विशेष रहेगा।

अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। दिनभर व्रत रखने के बाद श्रद्धालु रात में भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार करेंगे। जन्म के बाद चंद्रमा के दर्शन कर व्रत खोलें। धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

आज शुक्रवार को जन्माष्टमी

इस बार भी जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा की स्थिति रहेगी। भगवान कृष्ण के अवतरण के समय बुधवार का दिन था, लेकिन इस बार जन्माष्टमी शुक्रवार को पड़ रही है। दिन अलग होने के बावजूद रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा की स्थिति इस पर्व को खास बना रही है।

कुरुक्षेत्र में 11:21 बजे चंद्रोदय

राष्ट्रपति अवॉर्डी एवं प्राचीन श्री दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर के पीठाध्यक्ष पंडित प्रेम कुमार शर्मा ने बताया कि सनातन परंपरा में जन्माष्टमी का व्रत रखने के बाद चंद्रमा के दर्शन कर व्रत खोलने की मान्यता है। इस बार अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय के समय में कुछ मिनट का अंतर रहेगा।

उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र और चंडीगढ़ में रात 11:21 बजे, दिल्ली और जालंधर में 11:24 बजे, अयोध्या और वाराणसी में 11:09 बजे, प्रयागराज में 11:14 बजे, जम्मू में 11:29 बजे, पटियाला में करीब 11:22 बजे और मथुरा में रात 11:26 बजे चंद्रोदय होगा। यानी देश के अलग-अलग हिस्सों में चंद्रमा के दर्शन अलग समय पर होंगे।

गृहस्थ का अष्टमी में व्रत-पूजन, अगले दिन नंदोत्सव

पंडित प्रेम कुमार शर्मा ने बताया कि गृहस्थ लोग अष्टमी तिथि में व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें। वहीं वैष्णव परंपरा में जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाने का महत्व है, क्योंकि जन्म के अगले दिन नंद बाबा के घर खुशियां मनाई गई थीं। इसी परंपरा में जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है।

कुरुक्षेत्र से श्री कृष्ण का खास रिश्ता

कुरुक्षेत्र को उनकी बाल्यावस्था, युवाकाल और विराट स्वरूप के दर्शन सौभाग्य मिला है। वे बाल्यावस्था में दाऊ बलराम के साथ पहली बार कुरुक्षेत्र आए थे। यहां 52 शक्तिपीठों में शुमार श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर में उनके कुल पुरोहित गार्ग्याचार्य ने उनका मुंडन संस्कार कराया था। मां भद्रकाली यदुवंश की कुलदेवी हैं।

सूर्यग्रहण मेले में श्रीराधा से मिले कृष्ण

दूसरी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण दूसरी बार सूर्यग्रहण के मेले पर कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर पर आए थे। तब ब्रह्मसरोवर तट पर उन्होंने पड़ाव डाला था। यहां आखिरी बार श्रीकृष्ण का राधा और अन्य गोपियों के साथ मिलन हुआ था। सूर्यग्रहण पर पवित्र स्नान के बाद गोपियां श्रीकृष्ण के रथ को खींचते हुए वृंदावन लेकर गईं थीं।

कुरुक्षेत्र से विश्व में फैला गीता का दिव्य ज्ञान

पंडित प्रेम कुमार शर्मा ने कहा कि जग जाहिर है कि कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के पवित्र चरण महाभारत युद्ध के दौरान पड़े। इस युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अपने श्रीमुख से कुरु भूमि में खड़े होकर अर्जुन को गीता का ज्ञान और कर्म का संदेश दिया। यहीं से गीता का दिव्य ज्ञान पूरे विश्व में फैला। यही कारण है कि कुरुक्षेत्र को भगवान श्रीकृष्ण की कर्मस्थली होने का गौरव भी हासिल है।