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Telephone Allowances : विधायकों के टेलीफोन भत्ते पर मचा बवाल, जानें क्या है पूरा मामला?

 
Telephone Allowances : लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाएं हमेशा चर्चा और बहस का विषय रही हैं। वेतन और भत्तों का मूल उद्देश्य यह माना जाता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि आर्थिक चिंता से मुक्त होकर जनता की सेवा कर सकें। लेकिन जब इन सुविधाओं का आकार बढ़ता है और उनके उपयोग में पारदर्शिता कम दिखाई देती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा द्वारा विधायकों और विधान पार्षदों के लिए मासिक टेलीफोन भत्ता बढ़ाकर 8300 रुपये करने का निर्णय सामने आया है। 

इस फैसले की सबसे खास बात यह है कि यह राशि बिना किसी बिल या वाउचर के दी जाएगी। यानी खर्च का प्रमाण देना अनिवार्य नहीं होगा। यही कारण है कि यह विषय अचानक सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बन गया है।

आज का भारत डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रहा है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने संचार के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। कुछ साल पहले तक कॉल दरें और डेटा पैक महंगे हुआ करते थे, लेकिन अब निजी टेलीकॉम कंपनियों के कारण संचार सेवाएं काफी सस्ती हो चुकी हैं। आम नागरिक 300 से 400 रुपये के मासिक रिचार्ज में अनलिमिटेड कॉल, डेटा और संदेश की सुविधा प्राप्त कर लेता है। ऐसे समय में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब देश का आम व्यक्ति इतनी कम राशि में अपना संचार चला सकता है, तो जनप्रतिनिधियों के लिए हजारों रुपये का अलग भत्ता क्यों आवश्यक है।

बिहार के इस निर्णय ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है। राज्य में कुल 243 विधायक हैं। यदि हर विधायक को प्रति माह 8300 रुपये का टेलीफोन भत्ता दिया जाता है, तो सालाना यह राशि करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है। आलोचकों का कहना है कि यह पैसा सार्वजनिक धन है और इसे शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास या अन्य जरूरी क्षेत्रों में भी लगाया जा सकता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कई लोग इसे अनावश्यक खर्च या राजनीतिक विशेषाधिकार के रूप में देख रहे हैं।

हालांकि इस विषय का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जनप्रतिनिधियों का काम केवल विधानसभा तक सीमित नहीं होता। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता से लगातार संपर्क बनाए रखना पड़ता है। नागरिकों की समस्याएं सुनना, अधिकारियों से बातचीत करना, सरकारी योजनाओं की जानकारी देना और पार्टी के कार्यक्रमों में भाग लेना—इन सबके लिए निरंतर संचार जरूरी होता है। कई बार एक विधायक को दिन भर में सैकड़ों फोन कॉल करने या प्राप्त करने पड़ते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या के कारण अलग-अलग कंपनियों के सिम कार्ड भी रखने पड़ते हैं। इसके अलावा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ऑनलाइन बैठकें और सोशल मीडिया के माध्यम से संवाद भी अब जनप्रतिनिधियों के काम का हिस्सा बन चुके हैं।

फिर भी बहस का असली मुद्दा केवल राशि नहीं, बल्कि पारदर्शिता है। यदि किसी भत्ते का उपयोग स्पष्ट रूप से दर्ज हो और उसका हिसाब सार्वजनिक हो, तो विवाद कम हो जाते हैं। लेकिन जब भत्ता बिना बिल के दिया जाता है, तब यह संदेह पैदा होता है कि कहीं यह सुविधा अतिरिक्त आय का माध्यम तो नहीं बन रही। यही कारण है कि कई विशेषज्ञों का मानना है कि संचार भत्ता दिया जाना गलत नहीं है, लेकिन उसके उपयोग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना जरूरी है।

भारत के विभिन्न राज्यों में विधायकों को मिलने वाले टेलीफोन या संचार भत्ते अलग-अलग हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में विधायकों को लगभग 10,000 रुपये तक का संचार भत्ता मिलता है। महाराष्ट्र जैसे बड़े और महंगे राज्य में यह राशि इससे भी अधिक हो सकती है। दूसरी ओर हरियाणा में अपेक्षाकृत कम भत्ता दिया जाता है। केरल ने कोविड महामारी के बाद अपने भत्तों में कटौती कर एक उदाहरण भी पेश किया था। वहीं दिल्ली में संचार और यात्रा भत्ते को मिलाकर दिया जाता है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि राज्यों में कोई समान नीति नहीं है और हर राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेता है।

यह भी सच है कि समय के साथ तकनीक ने संचार को आसान और सस्ता बना दिया है। पहले जहां लंबी दूरी की कॉल महंगी होती थी, वहीं आज इंटरनेट आधारित सेवाओं ने संचार की लागत को काफी कम कर दिया है। व्हाट्सएप कॉल, वीडियो मीटिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से संवाद अब सामान्य बात हो गई है। इसलिए कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि क्या भत्तों की वर्तमान संरचना अभी भी पुराने समय की जरूरतों के आधार पर चल रही है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माने जाते हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है ताकि वे उनकी समस्याओं को समझें और समाधान के लिए काम करें। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध हो, तो जनता का विश्वास भी मजबूत होता है। लेकिन जब खर्च का विवरण अस्पष्ट होता है, तब आलोचना स्वाभाविक हो जाती है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने के लिए कुछ सुधार किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, टेलीफोन भत्ते के लिए बिल या डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य किया जा सकता है। सरकार चाहें तो आधिकारिक मोबाइल कनेक्शन उपलब्ध करा सकती है, जिससे खर्च सीधे नियंत्रित और मॉनिटर किया जा सके। इसके अलावा भत्ते की एक अधिकतम सीमा तय की जा सकती है ताकि अनावश्यक खर्च से बचा जा सके। समय-समय पर ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्ट भी इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बना सकती है।

यह मुद्दा केवल एक भत्ते का नहीं, बल्कि शासन की सोच का भी है। यदि सरकारें और जनप्रतिनिधि खुद पारदर्शिता को बढ़ावा देंगे, तो जनता का भरोसा भी मजबूत होगा। दूसरी ओर यदि सुविधाएं बढ़ती रहें और जवाबदेही कम होती जाए, तो लोकतंत्र में अविश्वास की भावना पैदा हो सकती है।

अंततः यह समझना जरूरी है कि जनप्रतिनिधियों को संचार के साधन उपलब्ध कराना गलत नहीं है। वास्तव में यह उनकी जिम्मेदारियों को निभाने में मदद करता है। लेकिन इस सुविधा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो व्यावहारिक भी हो और जवाबदेह भी। आज जब देश डिजिटल पारदर्शिता की ओर बढ़ रहा है, तब सरकारी खर्च के हर पहलू को भी उसी दिशा में ले जाना समय की मांग है।

टेलीफोन भत्ते पर उठी यह बहस हमें एक व्यापक प्रश्न की ओर ले जाती है—क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था जनता के प्रति उतनी ही जवाबदेह है जितनी होनी चाहिए? यदि इस बहस से पारदर्शिता और सुधार की दिशा में कदम बढ़ते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत होगा।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)