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हरियाणा में पहली बार एयरलिफ्ट हुए अंग: कुलपति डॉ एच के अग्रवाल

 एक 16 वर्षीय युवा ने 6 जिंदगियों को दी नई रोशनी
 

रोहतक , 26 मार्च। हरियाणा की धरती पर रविवार का दिन इतिहास में दर्ज हो गया, जब एक 16 वर्षीय युवा के परिवार ने अपने गहरे दुख को मानवता की सबसे बड़ी मिसाल में बदल दिया। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद इस किशोर के अंग दान किए गए, और पहली बार राज्य में अंगों को एयरलिफ्ट कर दूसरे अस्पताल तक पहुंचाया गया। यह कहना है पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एच के अग्रवाल का।

वे रविवार को ट्रॉमा सेंटर में अंगदान करने वाले परिवार को सांत्वना देने पहुंचे थे।
डॉ एच के अग्रवाल ने कहा को यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि संवेदनाओं, त्याग और उम्मीद का अद्भुत संगम था।

पीजीआइएमएस रोहतक के ट्रामा सेंटर में भर्ती इस युवा के जीवन की डोर जब टूट गई, तब उसके परिजनों ने ऐसा निर्णय लिया जो किसी भी साधारण इंसान के लिए बेहद कठिन होता है। अपने बेटे को खोने के असीम दुख के बीच उन्होंने दूसरों की जिंदगी बचाने का रास्ता चुना। यही वह क्षण था जब दर्द ने सेवा का रूप ले लिया और एक परिवार का साहस कई परिवारों की उम्मीद बन गया।

कुलपति डॉ. एच. के अग्रवाल ने इस पूरे घटनाक्रम को भावुक शब्दों में साझा करते हुए कहा कि यह हरियाणा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि युवा का लिवर इंस्टिट्यूट ऑफ़ लीवर और बीलियरी साइंसेस नई दिल्ली भेजा गया, जहां उससे दो मरीजों को नई जिंदगी मिलेगी। इसके अलावा एक किडनी पीजीआईएमएस रोहतक में ही एक जरूरतमंद मरीज को दी गई, जबकि दूसरी किडनी आर्मी के कमांड हॉस्पिटल चंडीमंदिर को आवंटित की गई।

डॉ अग्रवाल ने कहा कि इस प्रक्रिया का सबसे विशेष और प्रेरणादायक पहलू यह रहा कि चंडीमंदिर स्थित आर्मी कमांड हॉस्पिटल से डॉक्टरों की टीम हेलीकॉप्टर द्वारा बाबा मस्तनाथ हेलिपैड पहुंची। वहां से अंग को एयरलिफ्ट कर तुरंत कमांड हॉस्पिटल वापिस अस्पताल ले जाया गया। हर सेकंड की कीमत थी, हर पल किसी की जिंदगी से जुड़ा हुआ था। डॉ एच के अग्रवाल ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति और समन्वय हो, तो चिकित्सा क्षेत्र में चमत्कार संभव हैं।

डॉ अग्रवाल ने बताया कि दोनों कॉर्निया भी पीजीआईएमएस रोहतक को आवंटित किए गए, जिससे दो नेत्रहीन व्यक्तियों को दृष्टि मिलने की संभावना बनी। इस प्रकार एक 16 वर्षीय युवा ने अपने जाने के बाद भी 6 घरों में रोशनी और खुशियां भर दीं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानी है जो अब फिर से जीवन को मुस्कान के साथ जी सकेंगे।

डॉ. एच. के अग्रवाल ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि यह परिवार हमारे समाज के लिए प्रेरणा है क्योंकि अभी गत दिनों ही इस युवा के पिता की भी इसी सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। अपने सबसे कठिन समय में भी उन्होंने दूसरों के बारे में सोचा। यह त्याग और मानवता की सर्वोच्च मिसाल है। डॉ अग्रवाल ने आम जनता से अपील करते हुए कहा कि अंगदान को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ानी बेहद जरूरी है। अंगदान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का जीवन बदल सकता है। हमें इस दिशा में आगे बढ़ना होगा।  
डॉ अग्रवाल ने मीडिया का तहे दिल से धन्यवाद व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा जो यह  अंगदान जागरूकता मुहिम को बढ़ाने में अपना भरपूर सहयोग दिया जा रहा है उसी से आज प्रदेश में एक माह के अंदर तीन अंगदान संभव हो पाया है।
डॉ एच के अग्रवाल ने कहा कि अंत में यही कहा जा सकता है कि इस युवा ने अपने छोटे से जीवन में वह कर दिखाया, जो कई लोग पूरी जिंदगी में नहीं कर पाते। उसने यह साबित कर दिया कि इंसान की महानता उसके जीने में नहीं, बल्कि उसके जाने के बाद भी दूसरों के लिए जीने में होती है।

निदेशक डॉ. एस. के सिंघल ने भी इस अवसर पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि यह घटना न केवल चिकित्सा क्षेत्र में एक उपलब्धि है, बल्कि यह समाज के लिए एक संदेश भी है कि जीवन के बाद भी हम किसी के काम आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रेन डेड की स्थिति में अंगदान से कई लोगों को नया जीवन मिल सकता है, लेकिन इसके लिए परिवार की सहमति और समाज की समझ बेहद जरूरी है।

डॉ एस के सिंघल ने इस दौरान युवा को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह युवा भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसका यह कार्य उसे अमर बना देगा। डॉ. सिंघल ने कहा कि हमें यह समझना होगा कि जब जीवन समाप्त हो जाता है, तब हमारे अंग किसी और के लिए नई शुरुआत बन सकते हैं। यह सबसे बड़ा दान है—महादान। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अंगदान के लिए आगे आएं, अपने परिवार को इस बारे में जागरूक करें और जरूरत पड़ने पर ऐसा निर्णय लेने में संकोच न करें।


एलपीएस बोसार्ड के एमडी राजेश जैन ने कहा कि यह घटना हमें कई सवालों के सामने खड़ा करती है—क्या हम भी ऐसा साहस दिखा सकते हैं? क्या हम अपने जीवन के बाद किसी और को जीवन देने का निर्णय ले सकते हैं? भारत में आज भी हजारों लोग अंग प्रत्यारोपण के इंतजार में हैं। हर दिन कई मरीज सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर अंग नहीं मिल पाता।
राजेश बताया कि उन्होंने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए 5 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की, ताकि इस कठिन समय में उन्हें कुछ सहारा मिल सके।
राजेश जैन ने कहा की इस 16 वर्षीय युवा की कहानी केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत हो सकती है। यदि हर व्यक्ति इस संदेश को समझे और अपने जीवन में उतारे, तो हजारों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।