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हरियाणा सरकार का बड़ा फैसला: PG करने वाले इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए बॉन्ड नीति खत्म, अस्पतालों में ही देंगे सेवाएं 

  चंडीगढ़: हरियाणा सरकार ने सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों के लिए स्नातकोत्तर (PG) मेडिकल शिक्षा से जुड़ी नीति में बड़ा बदलाव किया है। संशोधित नीति के तहत अब क्लीनिकल विषयों में पीजी डिग्री हासिल करने वाले इन-सर्विस डॉक्टरों को मेडिकल एजुकेशन बॉन्ड की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार, सरकारी सेवा के दौरान क्लीनिकल स्पेशियलिटी में पोस्टग्रेजुएट डिग्री प्राप्त करने वाले डॉक्टरों को अब चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग (DMER) के संस्थानों में अनिवार्य सेवा नहीं देनी होगी। वे अपने मूल विभाग, मुख्य रूप से सरकारी अस्पतालों में ही सेवाएं जारी रख सकेंगे।
 
 चंडीगढ़: हरियाणा सरकार ने सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों के लिए स्नातकोत्तर (PG) मेडिकल शिक्षा से जुड़ी नीति में बड़ा बदलाव किया है। संशोधित नीति के तहत अब क्लीनिकल विषयों में पीजी डिग्री हासिल करने वाले इन-सर्विस डॉक्टरों को मेडिकल एजुकेशन बॉन्ड की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार, सरकारी सेवा के दौरान क्लीनिकल स्पेशियलिटी में पोस्टग्रेजुएट डिग्री प्राप्त करने वाले डॉक्टरों को अब चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग (DMER) के संस्थानों में अनिवार्य सेवा नहीं देनी होगी। वे अपने मूल विभाग, मुख्य रूप से सरकारी अस्पतालों में ही सेवाएं जारी रख सकेंगे।

2022 की नीति में थी 3 साल सेवा की शर्त

इससे पहले वर्ष 2022 की नीति के तहत पीजी पाठ्यक्रमों में 40 प्रतिशत आरक्षण का लाभ लेने वाले इन-सर्विस क्लीनिकल डॉक्टरों को पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन साल तक DMER संस्थानों में सेवा देना अनिवार्य था। अब सरकार ने इस शर्त को समाप्त कर दिया है, जिससे विशेषज्ञ डॉक्टरों को अधिक लचीलापन मिलेगा और वे सीधे स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान देते रहेंगे। हरियाणा सिविल डेंटल सर्विस (HCDS) के डॉक्टरों को भी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद यही सुविधा मिलेगी।

नॉन-क्लीनिकल और पैरा-क्लीनिकल डॉक्टरों पर लागू रहेगी शर्त

हालांकि, सरकार ने नॉन-क्लीनिकल और पैरा-क्लीनिकल विषयों में पीजी डिग्री प्राप्त करने वाले डॉक्टरों के लिए अनिवार्य सेवा की शर्त बरकरार रखी है। इन डॉक्टरों को तीन साल तक DMER के तहत संचालित मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों में सेवा देनी होगी। इसके बाद वे चाहें तो चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में स्थायी रूप से शामिल होने का विकल्प भी चुन सकते हैं। सरकार का मानना है कि इससे सरकारी मेडिकल कॉलेजों में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ेगी।

अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों दोनों को मिलेगा लाभ

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि संशोधित नीति का उद्देश्य अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को भी दूर करना है। उन्होंने कहा कि नॉन-क्लीनिकल विशेषज्ञों को शिक्षण संस्थानों की ओर और क्लीनिकल विशेषज्ञों को अस्पतालों में बनाए रखने से चिकित्सा शिक्षा और मरीजों की देखभाल दोनों को मजबूती मिलेगी

तेजी से बढ़ रहा मेडिकल शिक्षा ढांचा

हरियाणा में हाल के वर्षों में कई नए सरकारी मेडिकल कॉलेज स्थापित किए गए हैं। इसके चलते एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, फार्माकोलॉजी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी जैसे विषयों में योग्य फैकल्टी की मांग तेजी से बढ़ी है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह नई नीति लागू की है।

स्वास्थ्य ढांचे पर 815 करोड़ रुपये का प्रावधान

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए हरियाणा सरकार ने स्वास्थ्य अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 815 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 288 प्रतिशत अधिक है। वित्त वर्ष 2025-26 में स्वास्थ्य निर्माण कार्यों के लिए लगभग 210 करोड़ रुपये ही उपलब्ध कराए गए थे।

कई अस्पतालों के विस्तार कार्य जारी

सरकार राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर भी तेजी से काम कर रही है। प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं:

  • अंबाला कैंट सिविल अस्पताल में 100 से 200 बेड के विस्तार ब्लॉक का निर्माण, जिसे फरवरी 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

  • गुरुग्राम के सेक्टर-10 सिविल अस्पताल को 100 से बढ़ाकर 200 बेड का किया जा रहा है, जिसकी समयसीमा मार्च 2027 तय की गई है।

  • हिसार के नारनौंद स्थित 100 बेड अस्पताल के उन्नयन का कार्य जारी है।

  • महेंद्रगढ़ जिले में 50 बेड अस्पताल को 100 बेड अस्पताल में बदलने की योजना पर भी काम चल रहा है।

सरकार का मानना है कि नई नीति और स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ते निवेश से राज्य में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।