बच्चों के भारी बस्तों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तैयारी, जानें क्या है शिक्षा विभाग की नई नीति
मिली जानकारी के अनुसार, विभाग ने शहर के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में 'स्कूल बैग पॉलिसी 2020' को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया है। 22 अप्रैल 2026 को जारी आदेशों के बाद अब स्कूलों में बस्तों का वजन तौला जाएगा। लेकिन यह केवल वजन घटाने की बात नहीं है, बल्कि बच्चों को किताबी दुनिया से बाहर निकालकर हुनर सिखाने की एक बड़ी पहल है। School Bag Weight Rule
आखिर क्यों बदली नीति?
जानकारी के मुताबिक, इस बदलाव की जड़ें 19 मई 2018 के मद्रास हाईकोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले में छिपी हैं। 'एम. पुरुषोत्तमन बनाम भारत संघ' मामले में अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य को देखते हुए स्कूल बैग के वजन के लिए एक सख्त नीति बनाई जाए। School Bag Weight Rule
मिली जानकारी के अनुसार, अदालत की इस टिप्पणी के बाद, केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय (तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय) ने NCERT, सीबीएसई और केवीएस के विशेषज्ञों के साथ मिलकर 'स्कूल बैग पॉलिसी 2020' तैयार की। चंडीगढ़ प्रशासन का ताजा आदेश इसी नीति को जमीन पर उतारने की कड़ी है। इसका उद्देश्य बच्चों को स्पोंडिलाइटिस, पीठ दर्द और फेफड़ों से जुड़ी उन समस्याओं से बचाना है जो भारी बस्तों के कारण बचपन में ही उन्हें घेर लेती हैं।
क्या है 10% का फॉर्मूला?
जानकारी के मुताबिक, नई नीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है शरीर के वजन और बस्ते के वजन का अनुपात। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सूरत में स्कूल बैग का वजन छात्र के शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। School Bag Weight Rule
इसे ऐसे समझें
मिली जानकारी के अनुसार, यदि पहली कक्षा के बच्चे का औसत वजन 15-20 किलो है, तो उसके बैग का वजन 1.5 से 2 किलो के बीच होना चाहिए। यदि आठवीं कक्षा के छात्र का वजन 40-45 किलो है, तो बैग 4-4.5 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। चंडीगढ़ शिक्षा विभाग की नवनिर्मित कमेटी अब स्कूलों में जाकर रैंडम चेकिंग करेगी। डिप्टी डीईओ-II रेनू शर्मा के नेतृत्व में यह कमेटी यह देखेगी कि क्या स्कूल टाइम-टेबल को इस तरह डिजाइन कर रहे हैं कि बच्चों को रोज सारी किताबें न लानी पड़ें।
'फ्लाइंग स्क्वायड' और सख्त निगरानी
जानकारी के मुताबिक, शिक्षा विभाग ने केवल आदेश जारी नहीं किए, बल्कि उनकी जवाबदेही भी तय की है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा गठित पांच सदस्यीय कमेटी में अनुभवी प्रिंसिपलों को शामिल किया गया है। School Bag Weight Rule
निगरानी के सख्त नियम
हर तीन महीने में स्कूलों का औचक निरीक्षण किया जाएगा।
कमेटी को हर महीने की 5 तारीख तक अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) विभाग को सौंपनी होगी।
कमेटी न केवल स्कूल प्रशासन से बात करेगी, बल्कि औचक निरीक्षण के दौरान सीधे बच्चों के बैग तौलेगी और अभिभावकों से उनकी राय लेगी। School Bag Weight Rule
स्कूलों को निर्देश दिए गए हैं कि वे भारी किताबों के विकल्प के तौर पर डिजिटल लर्निंग और हल्की शिक्षण सामग्री को बढ़ावा दें।
निगरानी कमेटी में ये हैं शामिल
संयोजक: रेनू शर्मा (डिप्टी DEO-II)
सदस्य: संगीता छाबड़ा (प्रिंसिपल, GMSSS-32C), मनजीत कौर (प्रिंसिपल, P.M. Shri GGMS-18), नरिंदर सिंह (प्रिंसिपल, GMSSS-रायपुर कलां) और धर्मेंद्र (हेडमास्टर, GMHS-कारसान)।
क्या है पूरा प्लान?
जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत सबसे रोचक बदलाव '10-दिन का बैगलेस पीरियड' है। यह नियम कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए है। School Bag Weight Rule
बिना बस्ते के क्या करेंगे छात्र?
मिली जानकारी के अनुसार, इन 10 दिनों में बच्चों को स्कूल तो आना होगा, लेकिन किताबों के साथ नहीं। उन्हें स्थानीय विशेषज्ञों के पास 'इंटर्नशिप' के लिए ले जाया जाएगा।
छात्र बढ़ईगिरी (Carpentry), बिजली का काम, मेटल वर्क, बागवानी (Gardening) और मिट्टी के बर्तन बनाने जैसी कलाएं सीखेंगे। School Bag Weight Rule
इसका मकसद छात्रों को किताबी कीड़ा बनाने के बजाय उनमें 'वोकेशनल स्किल्स' विकसित करना है, ताकि वे भविष्य के लिए स्वावलंबी बन सकें। विभाग ऑनलाइन मोड में भी व्यावसायिक कोर्स उपलब्ध कराएगा।
नई चुनौतियां और समाधान
जानकारी के मुताबिक, नीति को सफल बनाने के लिए स्कूलों को अपना ढांचा बदलना होगा। स्कूलों को अब कक्षाओं में ऐसी अलमारियां (Lockers) देनी होंगी जहाँ बच्चे अपनी भारी किताबें छोड़ सकें। वहीं, शिक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे गृहकार्य (Homework) इस तरह दें कि बच्चों को कम से कम किताबें घर ले जानी पड़ें। School Bag Weight Rule
सख्ती और सजा
मिली जानकारी के अनुसार, विभाग ने स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यदि कोई निजी स्कूल बार-बार नियमों की अनदेखी करता है, तो उसकी मान्यता पर भी संकट आ सकता है।